तीनों ऋतुओं में सुख का वर्धक
पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (ओषधीनां वर्धनः) = ओषधियों को बढ़ानेवाला, (अपां वर्धनः) = जलों को बढ़ानेवाला, मेघवत् सूर्यवत् (देव:) = प्रकाश, जल का दाता (विश्वस्य जगतः ईशे) = सब जगत् का स्वामी है। वह (त्रिवर्तु ज्योतिः यंसत्) = तीनों ऋतुओं में सुखप्रद प्रकाश देता है वैसे ही (यः) = जो (देवः) = प्रभु (ओषधीनां वर्धनः) = उष्णता के धारक जीवों को बढ़ानेवाला, (य:) = जो (अपां वर्धनः) = जलचारी जीवों को बढ़ानेवाला और (य:) = जो (विश्वस्य जगतः) = समस्त जगत् का ईशे स्वामी है। (सः) = वह परमेश्वर (अस्मे) = हमें (सु-अभिष्टिः) = सुख से चाहने योग्य (त्रिवर्तु ज्योतिः) = त्रिविध ज्ञानदाता वेदमय प्रकाश और (त्रि-धातु) = तीन धातु सुवर्णादि से बने (शरणं) = गृह और तीन धातु वात, पित्त, कफ से बने शरणयोग्य देह और (त्रिवर्तु) = तीनों कालों में वर्त्तनेवाला सुख (यंसत्) = दे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- समस्त जगत् का स्वामी परमेश्वर वात, पित्त, कफ इन तीन धातुओं से बने देह प्रदान करके सुख के साधन त्रिवेदमय ऋग्, यजु, साम रूप वाणी देता है। गर्मी, सर्दी, वर्षा इन तीन ऋतुओं में विभिन्न प्रकार के पदार्थ ऋतु के अनुकूल प्रदान करता है तथा जलचर, नभचर, थलचर तीनों प्रकार के जीवों को बढ़ने के साधन भी देता है।