जी॒मूत॑स्येव भवति॒ प्रती॑कं॒ यद्व॒र्मी याति॑ स॒मदा॑मु॒पस्थे॑। अना॑विद्धया त॒न्वा॑ जय॒ त्वं स त्वा॒ वर्म॑णो महि॒मा पि॑पर्तु ॥१॥
jīmūtasyeva bhavati pratīkaṁ yad varmī yāti samadām upasthe | anāviddhayā tanvā jaya tvaṁ sa tvā varmaṇo mahimā pipartu ||
जी॒मूत॑स्यऽइव। भ॒व॒ति॒। प्रती॑कम्। यत्। व॒र्मी। याति॑। स॒ऽमदा॑म्। उ॒पऽस्थे॑। अना॑विद्धया। त॒न्वा॑। ज॒य॒। त्वम्। सः। त्वा॒। वर्म॑णः। म॒हि॒मा। पि॒प॒र्तु॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब उन्नीस ऋचावाले पचहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में शूरवीर किसे धारण कर क्या-क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वर्म-कवच की महिमा
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ शूरवीराः किं धृत्वा किं किं कुर्युरित्याह ॥
हे वीर ! यज्जीमतूस्येव प्रतीकं वर्म भवति तेन वर्मी भूत्वा समदामुपस्थे याति अनाविद्धया तन्वा त्वं शत्रूञ्जय स वर्मणो महिमा त्वा पिपर्त्तु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What arms should the heroes hold and what should they do―is told.
O hero! the armor is beautiful like the cloud. Mailed warrior advances in the front of the battle. With your body unwounded by the arms and missiles conquer your enemies. Let the significance or thickness of the armor defend you.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात कवच इत्यादीच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
