वपु॒र्नु तच्चि॑कि॒तुषे॑ चिदस्तु समा॒नं नाम॑ धे॒नु पत्य॑मानम्। मर्ते॑ष्व॒न्यद्दो॒हसे॑ पी॒पाय॑ स॒कृच्छु॒क्रं दु॑दुहे॒ पृश्नि॒रूधः॑ ॥१॥
vapur nu tac cikituṣe cid astu samānaṁ nāma dhenu patyamānam | marteṣv anyad dohase pīpāya sakṛc chukraṁ duduhe pṛśnir ūdhaḥ ||
वपुः॑। नु। तत्। चि॒कि॒तुषे॑। चि॒त्। अ॒स्तु॒। स॒मा॒नम्। नाम॑। धे॒नु। पत्य॑मानम्। मर्ते॑षु। अ॒न्यत्। दो॒हसे॑। पी॒पाय॑। स॒कृत्। शु॒क्रम्। दु॒दु॒हे॒। पृश्निः॑। ऊधः॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ग्यारह ऋचावाले छियासठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर वह किसके तुल्य क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मरुतों के तीन रूप [प्राण, सैनिक, वृष्टि की वायुवें]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः सा किंवत्किं करोतीत्याह ॥
हे पत्नि ! यथोधः पृश्निश्च सकृञ्छुक्रं दुदुहे तथा धेन्विव त्वं मर्त्तेषु पत्यमानं पतिमन्यद्दोहसे पीपायैवं भूतायास्तव यच्चित्समानं वपुर्नाम च तच्चिकितुषे पत्ये न्वस्तु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What does a good woman do like whom-is told.
O wife ! as night and firmament fill the virile once, in the same manner, you being like the cow make your active husband grow more and more in order to take the essence of all things and fill it well. When you behave like this, let your good name and lovely body be for your husband.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात वायूच्या गुणाप्रमाणे विद्वान व वीरांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर पूर्व सूक्तार्थाची संगती जाणावी.
