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यस्या॑ अन॒न्तो अह्रु॑तस्त्वे॒षश्च॑रि॒ष्णुर॑र्ण॒वः। अम॒श्चर॑ति॒ रोरु॑वत् ॥८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasyā ananto ahrutas tveṣaś cariṣṇur arṇavaḥ | amaś carati roruvat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्याः॑। अ॒न॒न्तः। अहु॑तः। त्वे॒षः। च॒रि॒ष्णुः। अ॒र्ण॒वः। अमः॑। चर॑ति। रोरु॑वत् ॥८॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:61» मन्त्र:8 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:31» मन्त्र:3 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वाणी कैसी है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यस्याः) जिस वाणी का (अह्रुतः) अकुटिल सरल (त्वेषः) प्रकाश वा (चरिष्णुः) जानेवाले (अनन्तः) निःसीम (अर्णवः) समुद्र के तुल्य आकाश (रोरुवत्) निरन्तर शब्द करता वा (अमः) फैलनेवाला (चरति) प्राप्त होता है, उसको तुम जानो ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जितना आकाश है, उतना ही शब्द अनन्त है, जैसे समुद्र में जल पूरा है, वैसे आकाश में शब्द है, यह जानो ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अनन्त बल

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम उस सरस्वती की आराधना करें (यस्याः) = जिसका (अमः) = बल (अनन्तः) = अपरिमित है। (अह्रुतः) = कुटिलता से रहित है, (त्वेष:) = दीप्त है तथा (चरिष्णुः) = गतिशील है। सरस्वती की आराधना से अनन्त बल को प्राप्त करते हुए हम अकुटिल दीप्त व गतिशील जीवनवाले बनते हैं। [२] इस सरस्वती का (अर्णवः) = प्रशस्त ज्ञान जलवाला बल (रोरुवत्) = खूब ही प्रभु के नामों का उच्चारण करता हुआ (चरति) = गतिवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– स्वाध्याय हमें 'शक्तिशाली, अकुटिल, दीप्त, गतिशील व प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाला' बनाता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सा वाक् कीदृशीत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यस्या वाचोऽह्रुतस्त्वेषश्चरिष्णुरनन्तोऽर्णवो रोरुवदमश्चरति तां यूयं विजानीत ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्याः) सरस्वत्या वाचः (अनन्तः) निःसीमः (अह्रुतः) अकुटिलः सरलः (त्वेषः) प्रकाशः (चरिष्णुः) गन्ता (अर्णवः) समुद्र इवाऽऽकाशः (अमः) यो गच्छति (चरति) प्राप्नोति (रोरुवत्) भृशं रौति शब्दं करोति ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यावानाकाशस्तावानेव शब्दोऽनन्तो यथा समुद्रे जलं पूर्णमस्ति तथैवाऽऽकाशे शब्दोऽस्तीति विजानीत ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whose radiation of light and dynamic flow of speech moves on and on endless, straight and upright, roaring across the ocean of space, that is the Mother Sarasvati.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is the speech is further told.

अन्वय:

O men you should know the nature and power of that well trained speech well, whose straightforward, limitless light is like the sky or the ocean, swift moving and going everywhere making great sound is attained by the wise.

भावार्थभाषाः - The sound is endless like the sky. As water is full in the ocean, so there is sound in the sky. This is what you should know.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! जितके आकाश आहे तितके शब्द अनंत आहेत. जसे समुद्रात जल परिपूर्ण असते तसे आकाशात शब्द असतात हे जाणा. ॥ ८ ॥