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त्रि॒ष॒धस्था॑ स॒प्तधा॑तुः॒ पञ्च॑ जा॒ता व॒र्धय॑न्ती। वाजे॑वाजे॒ हव्या॑ भूत् ॥१२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

triṣadhasthā saptadhātuḥ pañca jātā vardhayantī | vāje-vāje havyā bhūt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्रि॒ऽस॒धस्था॑। स॒प्तऽधा॑तुः। पञ्च॑। जा॒ता। व॒र्धय॑न्ती। वाजे॑ऽवाजे। हव्या॑। भू॒त् ॥१२॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:61» मन्त्र:12 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:32» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वानो ! (त्रिषधस्था) तीन समान स्थानों में स्थित (सप्तधातुः) सात प्राण आदि जिसकी धारण करनेवाले (पञ्च) पाँच प्राणों से (जाता) प्रसिद्ध (वाजेवाजे) प्रत्येक व्यवहार वा प्रत्येक साम में (हव्या) उच्चारण करने योग्य (वर्धयन्ती) वृद्धि को प्राप्त कराती (भूत्) हो, उसका युक्ति के साथ अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् जन वाणी के योग को जानते हैं तो क्या-क्या बढ़ा नहीं सकते हैं ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'त्रिषधस्था' [सरस्वती]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार यह सरस्वती (त्रिषधस्था) = पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक रूप तीनों लोकों में साथ-साथ स्थित है, तीनों 'शरीर, हृदय, व मस्तिष्क' रूप पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक को यह समानरूप से तेज: पूर्ण करती है। (सप्तधातुः) = सात गायत्री आदि छन्दों से इसका धारण किया गया है। (पञ्च जाता) = यह पाँच उत्पन्न हुए-हुए 'पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश' रूप भूतों को, पाँच प्राणों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच अन्त:करणों [मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय] को (वर्धयन्ती) = बढ़ानेवाली होती है। [२] यह सरस्वती (वाजे वाजे) = प्रत्येक संग्राम में (हव्या भूत्) = पुकारने योग्य होती है। सब संग्रामों में इसी के द्वारा विजय की प्राप्ति होती
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सरस्वती 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों को उत्तम बनाती है। पञ्चभूत व पञ्च प्राण आदि सब पञ्चकों का वर्धन करती है। प्रत्येक संग्राम में पुकारने योग्य है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सा किं करोतीत्याह ॥

अन्वय:

हे विद्वांसः ! त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्च जाता वाजेवाजे हव्या वर्धयन्ती भूत्तां युक्त्या सम्प्रुयङ्ध्वम् ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिषधस्था) त्रिषु समानस्थानेषु या तिष्ठति सा (सप्तधातुः) सप्त प्राणादयो धारका यस्याः सा (पञ्च) पञ्चभ्यः प्राणेभ्यः (जाता) प्रसिद्धा (वर्धयन्ती) (वाजेवाजे) व्यवहारे सङ्ग्रामे सङ्ग्रामे वा (हव्या) उच्चारणीया (भूत्) भवति ॥१२॥
भावार्थभाषाः - यदि विद्वांसो वाग्योगं जानन्ति तर्हि किं किं वर्धयितुं न शक्नुवन्ति ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Existent and all pervasive in three regions of the world, sustained in seven, five elements, ahankara and mahat tattva, produced by five pranic energies, rising and expanding, Sarasvati, fluent speech and awareness, may, we pray, arise at our invocation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What else does the speech do-is told.

अन्वय:

O enlightened persons! use that speech properly, which pervades the three regions-earth, firmament and sky, which has seven (i.e. five Pranas, mind and intellect) as its upholders, which is manifested by the Pranas and which is to be. used at every dealing or at battles.

भावार्थभाषाः - If men know the proper use of speech, what is it that they cannot develop?
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्वान लोक वाणीचा उपयोग जाणतात ते कोणकोणत्या गोष्टी वर्धित करू शकणार नाहीत? ॥ १२ ॥