उ॒त नः॑ प्रि॒या प्रि॒यासु॑ स॒प्तस्व॑सा॒ सुजु॑ष्टा। सर॑स्वती॒ स्तोम्या॑ भूत् ॥१०॥
uta naḥ priyā priyāsu saptasvasā sujuṣṭā | sarasvatī stomyā bhūt ||
उ॒त। नः॒। प्रि॒या। प्रि॒यासु॑। स॒प्तऽस्व॑सा। सुऽजु॑ष्टा। सर॑स्वती। स्तोम्या॑। भू॒त् ॥१०॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसी है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सप्तस्वसा' सरस्वती
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः सा कीदृशीत्याह ॥
हे मनुष्या ! यथा नः सरस्वती प्रियासु प्रिया सप्तस्वसा सुजुष्टोत स्तोम्या भूत्तथा युष्माकमपि भवतु ॥१०॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is the speech-is further told.
O men ! we may acquire speech, which is very much desirable, very dear among the acts or women bestowing happiness, having seven (i.e. five Pranas, mind and intellect) as sisters, well-served or properly used and admirable.
