वांछित मन्त्र चुनें
510 बार पढ़ा गया

ह॒तो वृ॒त्राण्यार्या॑ ह॒तो दासा॑नि॒ सत्प॑ती। ह॒तो विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑ ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hato vṛtrāṇy āryā hato dāsāni satpatī | hato viśvā apa dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ह॒तः। वृ॒त्राणि॑। आर्या॑। ह॒तः। दासा॑नि। सत्प॑ती॒ इति॒ सत्ऽप॑ती। ह॒तः। विश्वाः॑। अप॑। द्विषः॑ ॥६॥

510 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:60» मन्त्र:6 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे कैसे हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (आर्या) उत्तम गुणकर्मस्वभावयुक्त (सत्पती) सज्जन पुरुषों के व्यवहारों के पालनेवाले सूर्य्य और बिजुली (वृत्राणि) मेघ के अवयवों को जैसे वैसे (विश्वा) समस्त (द्विषः) शत्रुजनों को (अप, हतः) मारते हैं वा (दासानि) दानों को (हतः) नष्ट करते हैं वा दुःखों को (हतः) दूर करते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो श्रेष्ठ गुणकर्मस्वभाववाले मनुष्य, सत्य धर्मनिष्ठ, आप्त सज्जनों के पालने और दुष्टों को हरनेवाले हों, उनका सदा सत्कार करो ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वृत्र दास तथा द्वेष' का विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] ये इन्द्र और अग्नि, बल व प्रकाश के देव (आर्या) = श्रेष्ठ हैं, शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले हैं [ऋ गतौ]। ये (वृत्राणि हतः) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को विनष्ट करते हैं। (सत्पती) = ये इन्द्र और अग्नि सत् के [उत्तमता के] रक्षक हैं। ये (दासानि) = [दसु उपक्षये] हमें क्षीण करनेवाली सब वृत्तियों को (हतः) = समाप्त करते हैं । [२] (विश्वा:) = सब हमारे न चाहते हुए भी हमारे में घुस आनेवाली (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को (अपहतः) = सुदूर विनष्ट कर देते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– इन्द्र व अग्नि का आराधन वृत्र [= काम], दास [लोभ] तथा द्वेष [क्रोध] का निवारण करता है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तौ कीदृशावित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यावार्या सत्पती सूर्य्यविद्युतौ वृत्राणीव विश्वा द्विषोप हतः। दासान्यप हतो दुःखान्यप हतस्तौ सत्कर्त्तव्यौ ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (हतः) हिंसकः (वृत्राणि) मेघाऽवयवान् (आर्या) उत्तमगुणकर्मस्वभावौ (हतः) (दासानि) दानानि (सत्पती) सतां पुरुषाणां व्यवहाराणां वा पालकौ (हतः) (विश्वा) अखिलान् (अप) (द्विषः) शत्रून् ॥६॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! ये श्रेष्ठगुणकर्मस्वभावा मनुष्याः सत्यधर्मनिष्ठा आप्तानां पालका दुष्टानां प्रहर्त्तारः स्युस्तान् सदा सत्कुरुत ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Agni, divine powers of omnipotent will and vision, of holy nature, character and action, defenders of Truth and Law, destroy evil, darkness and want, destroy pain, suffering and slavery, destroy and eliminate all hate and enmity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How are they (King and Prime Minister)-is told.

अन्वय:

O men! you should honor those kings and ministers, who being endowed with noble virtues, actions and temperament and protectors of the righteous persons, destroy all malicious enemies like the sun and lightning dissipating the clouds, and destroy all miseries.

भावार्थभाषाः - O men! always honor those persons endowed with noble virtues actions and temperament, who have devotion towards true Dharma are protectors or supporters of absolutely truthful enlightened person sand slayers of the wicked.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! जी श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभावयुक्त माणसे, सत्यधर्मनिष्ठ, आप्त सज्जनांचे पालक व दुष्टांचा पराभव करणारी असतात त्यांचा सदैव सत्कार करा. ॥ ६ ॥