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ता नो॒ वाज॑वती॒रिष॑ आ॒शून्पि॑पृत॒मर्व॑तः। इन्द्र॑म॒ग्निं च॒ वोळ्ह॑वे ॥१२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā no vājavatīr iṣa āśūn pipṛtam arvataḥ | indram agniṁ ca voḻhave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता। नः॒। वाज॑ऽवतीः। इषः॑। आ॒शून्। पि॒पृ॒त॒म्। अर्व॑तः। इन्द्र॑म्। अ॒ग्निम्। च॒। वोळ्ह॑वे ॥१२॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:60» मन्त्र:12 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को किससे क्या करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम जो (नः) हमारे लिये (वाजवतीः) प्रशस्त विज्ञानयुक्त (इषः) अन्नादि पदार्थों और (आशून्) शीघ्रगामी (अर्वतः) घोड़ों को (पिपृतम्) पूर्ण करते हैं (ता) उन (इन्द्रम्) बिजुली रूप अग्नि (अग्निम्, च) और प्रसिद्ध अग्नि को (वोळ्हवे) विमान आदि यानों को वहाने के लिये संग्र­ह करो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम बिजुली आदि पदार्थों से विमान आदि यानों को चलाकर इच्छाओं को पूर्ण करो ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वाजवती इषः, आशून् अर्वतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ता) = वे इन्द्र और अग्नि (नः) = हमारे लिये (वाजवतीः इषः) = प्रशस्त शक्तिवाली प्रेरणाओं को (पिपृतम्) = पूरित करें। अर्थात् हमें प्रकाशमय हृदय में प्रभु प्रेरणाओं को प्राप्त करायें और उन प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने के लिये शक्ति दें। ये इन्द्र और अग्नि (आशून् अर्वतः) = शीघ्र गतिवाले इन्द्रियाश्वों को भी प्राप्त करायें। हमारी कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों ही उत्तम हों। [२] ये ज्ञानेन्द्रियाँ (अग्निम्) = प्रकाश की देवता को (वोढवे) = वहन करने के लिये हों, (च) = तथा कर्मेन्द्रियाँ (इन्द्रम्) = बल की देवता का वहन करें। ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान को देनेवाली हों, तो कर्मेन्द्रियाँ शक्ति का वर्धन करनेवाली बनें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम इन्द्र व अग्नि का आराधन करते हुए प्रशस्त प्रेरणाओं से युक्त बल को तथा शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाले इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः केन किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यूयं यौ नो वाजवतीरिष आशूनर्वतः पिपृतं तेन्द्रमग्निं च वोळ्हवे सङ्गृह्णीत ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ता) तौ (नः) अस्मभ्यम् (वाजवतीः) प्रशस्तविज्ञानयुक्तान् (इषः) अन्नादीन् (आशून्) आशुगामिनः (पिपृतम्) पूरयेताम् (अर्वतः) अश्वान् (इन्द्रम्) विद्युतम् (अग्निम्) प्रसिद्धं पावकम् (च) (वोळ्हवे) विमानादियानानां वाहनाय ॥१२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यूयं विद्युदादिपदार्थैर्विमानादीनि यानानि चालयित्वेच्छाः पूरयत ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the two, Indra and Agni, electricity and fire, give us food and sustenance full of energy and excellence and provide us with modes of travel and transport. Let us too develop the fire and electricity, energy for transport and communication.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should men do with whom-is told.

अन्वय:

O men! take from all sides electricity and fire which fill us with good food along with admirable knowledge and speedy horses. Use them (electricity and fire) for driving aircraft and other vehicles.

भावार्थभाषाः - O men! you fulfil your desires of driving aero planes and other vehicles with the help of electricity etc.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! तुम्ही विद्युत इत्यादी पदार्थांनी विमान वगैरे याने चालवून इच्छा पूर्ण करा. ॥ १२ ॥