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स श्वि॑ता॒नस्त॑न्य॒तू रो॑चन॒स्था अ॒जरे॑भि॒र्नान॑दद्भि॒र्यवि॑ष्ठः। यः पा॑व॒कः पु॑रु॒तमः॑ पु॒रूणि॑ पृ॒थून्य॒ग्निर॑नु॒याति॒ भर्व॑न् ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa śvitānas tanyatū rocanasthā ajarebhir nānadadbhir yaviṣṭhaḥ | yaḥ pāvakaḥ purutamaḥ purūṇi pṛthūny agnir anuyāti bharvan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। श्वि॒ता॒नः। त॒न्य॒तुः। रो॒च॒न॒ऽस्थाः। अ॒जरे॑भिः। नान॑दत्ऽभिः। यवि॑ष्ठः। यः। पा॒व॒कः। पु॒रु॒ऽतमः॑। पु॒रूणि॑। पृ॒थूनि॑। अ॒ग्निः। अ॒नु॒ऽयाति॑। भर्व॑न् ॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:6» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:1» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यः) जो (यविष्ठः) अत्यन्त युवावस्था से युक्त जैसे वैसे अत्यन्त बली (पावकः) पवित्र और पवित्र करनेवाला (पुरुतमः) अतीव बहुरूप (श्वितानः) शुभ्रवर्ण (अजरेभिः) जीर्णपन आदि रोगरहित (नानदद्भिः) निरन्तर गर्जनाओं से (तन्यतुः) बिजुलीरूप (रोचनस्थाः) दीपन में स्थिर (अग्निः) अग्नि (भर्वन्) दहन करता हुआ (पुरूणि) बहुत (पृथूनि) विस्तीर्णों के (अनुयाति) पश्चात् जाता है (सः) वह आप लोगों को उत्तम प्रकार प्रयोग करने योग्य है ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् ! जो आप अङ्ग और उपाङ्ग के सहित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें ॥ ३ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ज्ञान द्वारा पवित्रता' व 'ऐश्वर्य प्राप्ति'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (श्वितान:) = अत्यन्त श्वेतवर्णवाले, एकदम शुद्ध व अपापविद्ध हैं। (तन्यतुः) = हमारे हृदयों में स्थित हुए-हुए ज्ञान-वाणियों का गर्जन करनेवाले हैं। (रोचनस्था:) = इस नक्षत्रों से देदीप्यमान अन्तरिक्षलोक में स्थित हैं। (अजरेभिः) = कभी जीर्ण न होनेवाले (नानदद्भिः) = खूब ऊँचे उच्चरित होते हुए इन वेद शब्दों से (यविष्ठः) = युवतम हैं, हमें बुराइयों से अधिक से अधिक दूर करनेवाले हैं। इन ज्ञानवाणियों से वे प्रभु हमें सब अच्छाइयों से युक्त करते हैं । [२] (यः) = जो अग्रेणी प्रभु (पावकः) = पवित्र करनेवाले हैं। पवित्रता के द्वारा (पुरुतमः) = हमारा अधिक से अधिक पालन व पूरण करनेवाले हैं। ये प्रभु (भर्वन्) = हमारे शत्रुओं का संहार करते हुए (पुरूणि) = पालन व पूरण करनेवाले (पृथूनि) = विशाल धनों को (अनुयाति) = [या प्रापणे] अनुकूलता से प्राप्त कराते हैं । प्रभु से प्राप्त कराये गये धन हमारे जीवनों में व्यसनों को उत्पन्न नहीं होने देते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञान देकर प्रभु हमारे जीवनों को पवित्र बनाते हैं। जीवनयात्रा की पूर्ति के लिये उत्कृष्ट धनों को देते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सोऽग्निः कीदृशोऽस्तीत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यो यविष्ठ इव बलिष्ठः पावकः पुरुतमः श्वितानोऽजरेभिर्नानदद्भिस्तन्यतू रोचनस्था अग्निर्भर्वन् सन्पुरूणि पृथून्यनुयाति स युष्माभिः सम्प्रयोक्तव्यः ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (श्वितानः) शुभ्रवर्णः (तन्यतुः) विद्युतः (रोचनस्थाः) रोचने दीपने तिष्ठतीति (अजरेभिः) जरादिरोगरहितैः (नानदद्भिः) भृशं शब्दायमानैः (यविष्ठः) अतिशयेन युवावस्थः (यः) (पावकः) (पुरुतमः) (पुरूणि) बहूनि (पृथूनि) विस्तीर्णानि (अग्निः) पावकः (अनुयाति) अनुगच्छति (भर्वन्) भर्जनं दहनं कुर्वन् ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् ! यदि साङ्गोपाङ्गतो विद्युद्विद्यां जानीयास्तर्हि बहूनि सुखानि लभस्व ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That energy, Agni, which is brilliant, expansive and roaring, constant in light without a flicker, abiding in imperishable thunder and lightning, is the fire purifier which lies dormant in many forms in solids, and it is versatile and explosive.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The form of Agni (in the form of electricity) is told.

अन्वय:

O men ! you should apply Agni (electricity) for the accomplishment of various purposes which is white coloured, very powerful like the most youthful person, purifier, multiformed, loud voiced and undecaying, dwelling in splendor, and on burning ( switching to. Ed.) goes to various objects.

भावार्थभाषाः - O learned person ! if you know the sciences of energy/electricity with all its branches, you can enjoy much happiness.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे विद्वाना ! जर सांगोपांग विद्युतविद्या जाणली तर खूप सुख मिळते. ॥ २ ॥