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इन्द्रा॑ग्नी॒ तप॑न्ति मा॒घा अ॒र्यो अरा॑तयः। अप॒ द्वेषां॒स्या कृ॑तं युयु॒तं सूर्या॒दधि॑ ॥८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāgnī tapanti māghā aryo arātayaḥ | apa dveṣāṁsy ā kṛtaṁ yuyutaṁ sūryād adhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। तप॑न्ति। मा॒। अ॒घाः। अ॒र्यः। अरा॑तयः। अप॑। द्वेषां॑सि। आ। कृ॒त॒म्। यु॒यु॒तम्। सूर्या॑त्। अधि॑ ॥८॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:59» मन्त्र:8 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वान् जन किस-किस से बिजुली का स­ह करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभा सेनाधीशो ! जो (अरातयः) शत्रुजन (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को (तपन्ति) तपाते हैं उनके (द्वेषांसि) द्वेषयुक्त कामों को (अप, कृतम्) नष्ट करो और (सूर्यात्) सवितृमण्डल से (अधि) ऊपर जानेवाली बिजुली को (आ, युयुतम्) अलग करो। हे राजन् ! (अर्यः) स्वामी आप इन शिल्पीजनों को (मा, अघाः) मत मारो ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे राजसहित राजप्रजा जनो ! जो आप लोग सूर्यादिकों से बिजुली ग्रहण करना जानो तो शत्रुजनों को जीतकर द्वेषी जनों के दूर करने को समर्थ होओ ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्वेष से दूर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के तत्त्वो ! (अघा:) = [आहनतव्यः] चोट करनेवाली (अर्यः) = हमारे पर आक्रमण करनेवाली (अरातयः) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं की सेनाएँ (मा तपन्ति) = मुझे पीड़ित करती हैं। आप इन्हें (अपाकृतम्) = मेरे से दूर करिये। ज्ञान व बल की आराधना मुझे इन शत्रुओं के आक्रमण से बचाये। [२] हे (इन्द्राग्नी) = आप (द्वेषांसि) = द्वेष की भावनाओं को हमारे से दूर करो। वस्तुत: इन ईर्ष्या-द्वेष आदि की भावनाओं को तो (सूर्याद् अधि) = सूर्य दर्शन से भी (अप युयुतम्) = पृथक् कर दीजिये। सूर्य का जहाँ भी प्रकाश पहुँचता है, वहाँ द्वेष आदि का निवास न होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बल व प्रकाश का आराधन मुझे शत्रुओं के आक्रमण से बचाये। इनका आराधन मुझे द्वेष से दूर करे ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वांसः कस्मात्कस्माद्विद्युतं सङ्गृह्णीयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे सभासेनेशौ ! येऽरातय इन्द्राग्नी तपन्ति तेषां द्वेषांस्यपकृतं सूर्यादधि विद्युतमा युयुतम्। हे राजन्नर्यस्त्वमेताञ्छिल्पिनो माऽघाः ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राग्नी) वायुविद्युतौ (तपन्ति) (मा) (अघाः) हिंस्याः (अर्यः) स्वामी सन् (अरातयः) शत्रवः (अप) (द्वेषांसि) द्वेषयुक्तानि कर्माणि (आ) (कृतम्) कुर्य्यातम् (युयुतम्) विभाजयतम् (सूर्यात्) सवितृमण्डलात् (अधि) उपरिभावे ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे सराजका राजप्रजाजना यदि भवन्तः सूर्य्यादिभ्यो विद्युतं ग्रहीतुं विजानीयुस्तर्हि शत्रून् विजित्य द्वेष्टॄन् दूरीकर्तुं प्रभवेयुः ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Agni, lords of existence, enmities and sinful negativities of life heat up and consume me. Throw off all hate and enmities and keep them away from the light of the sun.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

From which things should the scientists derive electricity-is further told.

अन्वय:

O President of the Council of Ministers and Commander-in-Chief of the army! drive away the malicious acts of those foes, who abuse or use for evil designs the air and electricity and you derive electricity from the sun. O king! being the lord, do not kill or give trouble to these artists or artisans, who do such useful acts.

भावार्थभाषाः - O kings and their subjects! if you know how to take electricity from the sun and other objects, you can conquer your enemies and drive away all malicious persons.
टिप्पणी: Not understanding the scientific truth enunciated in the mantra both Prof. Wilson and Griffith have given a very wrong translation saying “murdering aggressive enemies harass us, drive away mine adversaries; separate them from (sight of ) the sun” (Prof. Wilson ) “The foeman's sinful enmities vex me sore. Drive those, who hate me far away, and keep them distant from the sun” (Griffith). How misleading and erroneous are such translations !
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे राजा व प्रजाजनहो ! जर तुम्ही सूर्यापासून विद्युत ग्रहण करणे जाणले तर शत्रूंना जिंकून द्वेष करणाऱ्यांना दूर करण्यास समर्थ व्हाल. ॥ ८ ॥