प्र नु वो॑चा सु॒तेषु॑ वां वी॒र्या॒३॒॑ यानि॑ च॒क्रथुः॑। ह॒तासो॑ वां पि॒तरो॑ दे॒वश॑त्रव॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ जीव॑थो यु॒वम् ॥१॥
pra nu vocā suteṣu vāṁ vīryā yāni cakrathuḥ | hatāso vām pitaro devaśatrava indrāgnī jīvatho yuvam ||
प्र। नु। वो॒च॒। सु॒तेषु॑। वा॒म्। वी॒र्या॑। यानि॑। च॒क्रथुः॑। ह॒तासः॑। वा॒म्। पि॒तरः॑। दे॒वऽश॑त्रवः। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। जीव॑थः। यु॒वम् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब दस ऋचावाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करके बलिष्ठ हों, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
बल व प्रकाश का मेल
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्याः किं कृत्वा बलिष्ठा जायेरन्नित्याह ॥
हे इन्द्राग्नी ! युवं यानि सुतेषु वीर्या चक्रथुस्तैर्वां देवशत्रवो हतास स्युश्चिरञ्जीवथ इति वामहं नु प्र वोचा। येन युवयोः पितरोऽप्येवं वामुपदिशन्तु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
By doing what, do man become mighty-is told.
O teachers and preachers you who are like the air and electricity, as a result of the valorous deeds that you do when things are made, let the enemies of the enlightened men be destroyed and may you live long, this is what I say to you. Let your father or guardians also preach to you like this.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र व अग्नीच्या गुणांचे वर्णन करण्याने या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
