य ए॑नमा॒दिदे॑शति कर॒म्भादिति॑ पू॒षण॑म्। न तेन॑ दे॒व आ॒दिशे॑ ॥१॥
ya enam ādideśati karambhād iti pūṣaṇam | na tena deva ādiśe ||
यः। ए॒न॒म्। आ॒ऽदिदे॑शति। क॒र॒म्भ॒ऽअत्। इति॑। पू॒षण॑म्। न। तेन॑। दे॒वः। आ॒ऽदिशे॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब छः ऋचावाले छप्पनवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में किसको किसके लिये क्या उपदेश करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'करम्भात्' प्रभु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ केन कस्मै किमुपदेष्टव्यमित्याह ॥
यः करम्भाद्देव एनं पूषणमादिदेशति इति तेन सहाऽहमन्यथा नादिशे ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What to teach and to whom is told.
I do not admire ivain the enlightened person, eater of mingled curd and meal, (parched burley meal and butter) who tells the nourisher about the nature of electricity. (He is indeed admirable).
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात उपदेशक, श्रोता व पूषा शब्दाच्या अर्थाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
