एहि॒ वां वि॑मुचो नपा॒दाघृ॑णे॒ सं स॑चावहै। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ नो भव ॥१॥
ehi vāṁ vimuco napād āghṛṇe saṁ sacāvahai | rathīr ṛtasya no bhava ||
आ। इ॒हि॒। वाम्। वि॒ऽमु॒चः॒। न॒पा॒त्। आघृ॑णे। सम्। स॒चा॒व॒है॒। र॒थीः। ऋ॒तस्य॑। नः॒। भ॒व॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब छः ऋचावाले पचपनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में किसका संग करना योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु स्मरण व यज्ञशीलता
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ कः सङ्गन्तव्य इत्याह ॥
हे आघृणे नपात् ! त्वं न ऋतस्य रथीर्भव न आ इहि, हे अध्यापकोपदेशकौ ! वामुक्तविद्वंस्त्वं विमुचस्त्वमहञ्च सं सचावहै ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Who should be associated with-is told.
O shining from all sides on account of good virtues, learned person! you who never fall down, come to us and be the driver of (the chariot of) truth. O scholar ! leave these teachers and preachers (to go to other places on their noble mission). Let me and yourself be united with love.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
