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पूष॒न्ननु॒ प्र गा इ॑हि॒ यज॑मानस्य सुन्व॒तः। अ॒स्माकं॑ स्तुव॒तामु॒त ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pūṣann anu pra gā ihi yajamānasya sunvataḥ | asmākaṁ stuvatām uta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पूष॑न्। अनु॑। प्र। गाः। इ॒हि॒। यज॑मानस्य। सु॒न्व॒तः। अ॒स्माक॑म्। स्तु॒व॒ताम्। उ॒त ॥६॥

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ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:54» मन्त्र:6 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

किन के सङ्ग से विद्या और राज्य को प्राप्त होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले ! आप (सुन्वतः) यज्ञ के सम्पादन करनेवाले (यजमानस्य) यज्ञकर्त्ता के (उत) और (स्तुवताम्) विद्या की प्रशंसा करनेवाले (अस्माकम्) हम लोगों की (गाः) सुन्दर शिक्षित वाणी वा भूमियों को (अनु, प्र, इहि) अनुकूलता से प्राप्त होओ ॥६॥
भावार्थभाषाः - हे शिल्पी विद्वान् जन ! आप राजधनादि के सहाय से हम से वा शिक्षा देनेवालों से विद्याओं को पाकर भूमिराज्य को प्राप्त होओ ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यजमान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पूषन्) = पोषक प्रभो ! (यजमानस्य) = यज्ञशील पुरुष के (गाः अनु प्र इहि) = इन्द्रियों के पीछे प्रकर्षेण चलनेवाले होइये, अर्थात् इस यज्ञशील पुरुष की इन्द्रियों का अच्छी प्रकार रक्षण करिये । इसी प्रकार (सुन्वतः) = सोम का अभिषव करते हुए पुरुष की इन्द्रियों का भी रक्षण करिये। जो भी व्यक्ति अपने अन्दर सोम [वीर्य] शक्ति का रक्षण करता है, उसकी इन्द्रियों को आप पूर्णतया रक्षित करिये। [२] (उत) = और (स्तुवताम्) = स्तवन करते हैं (अस्माकम्) = हमारी इन्द्रियों का रक्षण करिये एवं इन्द्रियों को सुरक्षित करने के लिये तीन उपाय हैं – [क] यज्ञों में लगे रहना, [ख] सोम शक्ति को सुरक्षित करना, [ग] प्रभु स्तवन में प्रवृत्त होना ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु यज्ञशील-सोमरक्षक-स्तोता की इन्द्रियों का रक्षण करते हैं। यज्ञशीलता से इन्द्रियाँ कुपथ प्रवृत्त नहीं होती। सुरक्षित सोम इन्हें सशक्त बनाता है। प्रभु स्तवन इन्हें विषयों में नहीं फँसने देता।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

केषां सङ्गेन विद्याराज्ये प्राप्नुयादित्याह ॥

अन्वय:

हे पूषंस्त्वँ सुन्वतो यजमानस्योत स्तुवतामस्माकं गा अनु प्रेहि ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पूषन्) (अनु) (प्र) प्रकर्षेण (गाः) सुशिक्षिता वाचो भूमीर्वा (इहि) प्राप्नुहि (यजमानस्य) (सुन्वतः) यज्ञं सम्पादयतः (अस्माकम्) (स्तुवताम्) विद्याप्रशंसकानाम् (उत) (अपि) ॥६॥
भावार्थभाषाः - हे शिल्पिंस्त्वं राजधनादिसहायेनाऽस्मच्छिक्षकेभ्यश्च विद्याः प्राप्य भूमिराज्यं प्राप्नुहि ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, giver of sustenance, acknowledge, protect and promote the developed lands, cows and words of knowledge of the yajamana and also of ours who are the celebrants of this yajna of development.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

By whose association can a man get knowledge and kingdom is told.

अन्वय:

O nourisher of the people! get suitably or agreeably the speeches or lands of the performer of the yajnas and ours, who are admirers of knowledge.

भावार्थभाषाः - O artist! obtain the kingdom of the land, by the help of the wealth got from the rulers and after acquiring the knowledge of various sciences from us and other teachers.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे कुशल कारागिरांनो ! तुम्ही राजधनाच्या साह्याने आमच्याकडून किंवा शिक्षकांकडून विद्या प्राप्त करून भूमीचे राज्य प्राप्त करा. ॥ ६ ॥