अ॒भि नो॒ नर्यं॒ वसु॑ वी॒रं प्रय॑तदक्षिणम्। वा॒मं गृ॒हप॑तिं नय ॥२॥
abhi no naryaṁ vasu vīram prayatadakṣiṇam | vāmaṁ gṛhapatiṁ naya ||
अ॒भि। नः॒। नर्य॑म्। वसु॑। वी॒रम्। प्रय॑तऽदक्षिणम्। वा॒मम्। गृ॒हऽप॑तिम्। न॒य॒ ॥२॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब स्त्रीपुरुषों को क्या चाहने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'नर्यं' वसु [कौन धन ?]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ स्त्रीपुरुषैः किमेष्टव्यमित्याह ॥
हे पूषंस्त्वं नः प्रयतदक्षिणं नर्यं वसु वामं वीरं गृहपतिं चाभि नय ॥२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men and women desire-is told.
O nourisher ! lead us to that wealth from all sides which contains guerdon, which is beneficial to all men and to an admirable master of the house, who is a heroic and virtuous man.
