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व॒यमु॑ त्वा पथस्पते॒ रथं॒ न वाज॑सातये। धि॒ये पू॑षन्नयुज्महि ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayam u tvā pathas pate rathaṁ na vājasātaye | dhiye pūṣann ayujmahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व॒यम्। ऊँ॒ इति॑। त्वा॒। प॒थः॒। प॒ते॒। रथ॑म्। न। वाज॑ऽसातये। धि॒ये। पू॒ष॒न्। अ॒यु॒ज्म॒हि॒ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:53» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:6» अनुवाक:5» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब दश ऋचावाले त्रेपनवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य किसके लिये किनका सेवन करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले (पथः) मार्ग के (पते) स्वामिन् ! (वयम्) हम लोग (उ) ही (वाजसातये) संग्राम का विभाग करनेवाली (धिये) प्रज्ञा के लिये (त्वा) आपको (रथम्) विमान आदि यान के (न) समान (अयुज्महि) प्रयुक्त करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम बुद्धि पाने के लिये विद्वानों की सेवा करते हैं, वे वेगवान् रथ से एक स्थान से दूसरे स्थान के समान एक विद्या से दूसरी विद्या को शीघ्र प्राप्त होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पोषक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पथस्पते) = मार्गों के स्वामिन् ! (पूषन्) = हमारा पोषण करनेवाले प्रभो! (वयम्) = हम (उ) = निश्चय से (त्वा) = आपको (अयुज्महि) = अपने साथ जोड़ते हैं। योग के द्वारा आपके साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करते हैं। प्रभु के साथ मेल होने पर हम मार्गों से भटकते नहीं तथा अपना ठीक पोषण कर पाते हैं। [२] आप (रथं न) = रथ के समान हैं। रथ यात्रापूर्ति में साधन बनता है, प्रभु का आश्रय भी जीवनयात्रा को सफलता से पूर्ण कराता है। हम आपको (वाजसातये) = शक्ति की प्राप्ति के लिये तथा धिये बुद्धि के लिये अपने साथ युक्त करते हैं। आपका मेल हमें शक्ति व बुद्धि को देनेवाला होगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सब मार्गों के स्वामी हैं, हमारा पोषण करनेवाले हैं। प्रभु के साथ सम्पर्क से हम शक्ति व बुद्धि को प्राप्त करते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मनुष्याः कस्मै कान् सेवेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

हे पूषन् पथस्पते ! वयमु वाजसातये धिये त्वा रथं नाऽयुज्महि ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वयम्) (उ) (त्वा) त्वाम् (पथः) मार्गस्य (पते) स्वामिन् (रथम्) विमानादियानम् (न) इव (वाजसातये) सङ्ग्रामविभाजिकायै (धिये) प्रज्ञायै (पूषन्) पुष्टिकर्त्तः (अयुज्महि) प्रयुञ्ज्महि ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। ये मनुष्याः प्रज्ञाप्राप्तये विदुषः सेवन्ते ते वेगवता रथेन स्थानान्तरमिव विद्यान्तरं सद्यः प्राप्नुवन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Pusha, lord giver of food and energy and guide and director over all our paths of life, for the sake of vision and wisdom and to reach the goal in our mission of life we take to you as one rides a chariot piloted by an all-wise driver.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Who should men serve and for what purpose is told.

अन्वय:

O nourisher, lord of the path ! we yoke (appoint) you for the intellect that divides different functions regarding warfare like the vehicle in the form of aircraft etc.

भावार्थभाषाः - Those men who serve the enlightened persons, for the attainment of good intellect, acquire the knowledge of various science one by one, as they go to distant places with speedy vehicles.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात राजमार्ग, दस्यूंचे निवारण, उत्तम दक्षिणा देणाऱ्यांना प्रेरणा, दुष्टांना मारणे, श्रेष्ठांचे पालन व पशूंची वृद्धी सांगितलेली आहे. त्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जी माणसे उत्तम बुद्धी प्राप्त करण्यासाठी विद्वानांची सेवा करतात. जसा वेगवान रथ एका स्थानाहून दुसऱ्या स्थानी जातो तशी एका विद्येने दुसरी विद्या ताबडतोब प्राप्त करतात. ॥ १ ॥