मा नो॒ वृका॑य वृ॒क्ये॑ समस्मा अघाय॒ते री॑रधता यजत्राः। यू॒यं हि ष्ठा र॒थ्यो॑ नस्त॒नूनां॑ यू॒यं दक्ष॑स्य॒ वच॑सो बभू॒व ॥६॥
mā no vṛkāya vṛkye samasmā aghāyate rīradhatā yajatrāḥ | yūyaṁ hi ṣṭhā rathyo nas tanūnāṁ yūyaṁ dakṣasya vacaso babhūva ||
मा। नः॒। वृका॑य। वृ॒क्ये॑। स॒म॒स्मै॒। अ॒घ॒ऽय॒ते। री॒र॒ध॒त॒। य॒ज॒त्राः॒। यू॒यम्। हि। स्थ। र॒थ्यः॑। नः॒। त॒नूना॑म्। यू॒यम्। दक्ष॑स्य। वच॑सः। ब॒भू॒व ॥६॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को किसकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
बल व ज्ञान के प्रापक देव
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं नैषितव्यमित्याह ॥
हे यजत्रा ! यूयं वृकाय वृक्ये समस्मा अघायते नोऽस्मान् मा रीरधता नस्तनूनां दक्षस्य वचसो रथ्य इव यूयं स्था हि सुखकारका बभूव ॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What men should not desire-is told.
O unifier ! do not give us away to thieves or to dishonest dealing like stealing, who may harm us. Do not allow us to be troubled by all men of sinful disposition. You are the guides of our bodies aright and rulers of powerful or effective speech and vehicles. You are bestowers of happiness upon us.
