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आ मा॑ पूष॒न्नुप॑ द्रव॒ शंसि॑षं॒ नु ते॑ अपिक॒र्ण आ॑घृणे। अ॒घा अ॒र्यो अरा॑तयः ॥१६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā mā pūṣann upa drava śaṁsiṣaṁ nu te apikarṇa āghṛṇe | aghā aryo arātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। मा॒। पू॒ष॒न्। उप॑। द्र॒व॒। शंसि॑षम्। नु। ते॒। अ॒पि॒ऽक॒र्णे। आ॒घृ॒णे॒। अ॒घाः। अ॒र्यः। अरा॑तयः ॥१६॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:48» मन्त्र:16 | अष्टक:4» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:6 | मण्डल:6» अनुवाक:4» मन्त्र:16


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले (आघृणे) सब ओर से प्रकाशमान ! जिन (ते) आपके (अपिकर्णे) ढंपे हुए कर्ण में मैं (नु) शीघ्र सत्य की (शंसिषम्) प्रशंसा करूँ सो (अर्यः) स्वामी हुए आप (आ) सब ओर से (मा) मेरे (उप, द्रव) समीप आओ और जो (अरातयः) न देनेवाले जन हों उन्हें शीघ्र (अघाः) हनिये अर्थात् मारिये ॥१६॥
भावार्थभाषाः - हे पालनीय जन ! आप रक्षा के लिये मेरे समीप आओ, मैं सत्योपदेश से तुम्हें विचक्षण करूँ तथा हम सब लोग मिल के दुष्टों का विनाश करें ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु शंसन व शत्रु संहार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पूषन्) = पोषक प्रभो ! (मा आद्रव) = मुझे प्राप्त होइये । (अघाः) = [आहन्तीः] हमारा हनन करनेवाली (अर्यः) = [अभिगन्ती:] आक्रमणकारिणी (अरातयः) = काम-क्रोध आदि शत्रु सेनाओं को (उपद्रव) = उपद्रुत करिये, बाधित करिये। [२] शत्रुओं के बाधन के उद्देश्य से ही मैं (नु) = अब (ते) = आपके (अपिकर्णे) = [कर्णावपिगते] कानों के समीप (शंसिषम्) = शंसन करनेवाला बनूँ । 'अपिकर्णे' यह शब्द इसी भाव का द्योतक है कि मैं आपकी उपासना में स्थित होऊँ । आपकी उपासना में स्थित हुआ-हुआ आपका शंसन करूँ और आपके गुणों का गायन करूँ । शत्रुओं को बाधित करने का यही तो उपाय है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु का शंसन करें। प्रभु हमारे शत्रुओं का बाधन करेंगे।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

हे पूषन्नाघृणे ! यस्य तेऽपिकर्णेऽहं नु सत्यं शंसिषं सोऽर्यस्त्वमा मा मामुप द्रव य अरातयः स्युस्तान्नु अघाः ॥१६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (मा) माम् (पूषन्) पुष्टिकर्त्तः (उप) (द्रव) समीपमागच्छ (शंसिषम्) प्रशंसेयम् (नु) सद्यः (ते) तव (अपिकर्णे) आच्छादितश्रोत्रे (आघृणे) सर्वतो दीप्तिमान् (अघाः) हन्याः (अर्यः) स्वामी सन् (अरातयः) अदातारः ॥१६॥
भावार्थभाषाः - हे पालनीय जन ! त्वं रक्षार्थं मत्सन्निधिमागच्छाऽहञ्च सत्योपदेशेन विचक्षणं कुर्यां वयं सर्वे मिलित्वा दुष्टान् विनाशयेम ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord giver of nourishment and sustenance, shining with knowledge and glowing with passion for action, come fast to me and I shall sing of your glory in truth close to your ear. O master of the community, eliminate hate, enmity, adversity and close-heartedness.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should men deal with one another-is told.

अन्वय:

O nourisher !lcome to me, I praise truth even in your covered ear: You are master of your senses (or servants). Slay them, who are miserly and wicked fellows.

भावार्थभाषाः - O men ! you deserve to be nourished, come to me for protection. I shall place the truth before you. Let us all destroy the wicked unitedly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे पालनकर्त्यांनो तुम्ही रक्षणासाठी माझ्याजवळ या, मी सत्योपदेशाने तुम्हाला बुद्धिमान करीन व आपण सर्वजण मिळून दुष्टांचा नाश करू. ॥ १६ ॥