आमूर॑ज प्र॒त्याव॑र्तये॒माः के॑तु॒मद्दु॑न्दु॒भिर्वा॑वदीति। समश्व॑पर्णा॒श्चर॑न्ति नो॒ नरो॒ऽस्माक॑मिन्द्र र॒थिनो॑ जयन्तु ॥३१॥
āmūr aja pratyāvartayemāḥ ketumad dundubhir vāvadīti | sam aśvaparṇāś caranti no naro smākam indra rathino jayantu ||
आ। अ॒मूः। अ॒ज॒। प्र॒ति॒ऽआव॑र्तय। इ॒माः। के॒तु॒ऽमत्। दु॒न्दु॒भिः। वा॒व॒दी॒ति॒। सम्। अश्व॑ऽपर्णाः। चर॑न्ति। नः॒। नरः॑। अ॒स्माक॑म्। इ॒न्द्र॒। र॒थिनः॑। ज॒य॒न्तु॒ ॥३१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर राजा आदि जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] हे प्रभो! (अमूः) = उन विषयों में चरती हुई इन्द्रियरूप गौओं को (आ अज) = हमारे प्रति आनेवाला करिये। (इमाः) = इन इन्द्रियों को प्रत्यावर्तय विषयों से व्यावृत्त करिये। (केतुमत्) = प्रशस्त ज्ञानवाली (दुन्दुभिः) = यह रणभेदी चेतना को जागरित करनेवाली दुन्दुभि (वावदीति) = खूब शब्द कर रही है इसके शब्द से जीवन को संग्राम की स्थिति में समझते हुए हम विषयों से पराङ्मुख रहें । [२] (नः नरः) = हमारे सब मनुष्य (अश्वपर्णाः) = इन्द्रियाश्वों का पालन व पूरण करनेवाले होते हुए (संचरन्ति) = सम्यक् गतिवाले होते हैं। हे इन्द्र-शत्रुविद्रावक प्रभो! (अस्माकम्) = हमारे (रथिनः) = रथी पुरुष, शरीर रथ के स्वामी पुरुष (जयन्तु) = सदा विजयी हों। ये कभी भी काम-क्रोध आदि शत्रुओं के शिकार न होते हुए बाह्य शत्रुओं को भी पराजित करनेवाले हों।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुना राजादयो जनाः किं कुर्य्युरित्याह ॥
हे इन्द्र राजँस्त्वं यथा दुन्दुभिः केतुमद्वावदीति तथेमा अश्वपर्णाः स्वसेनाः प्रत्यावर्त्तय ताभिरमूः शत्रुसेना दूर आज। येऽस्माकं रथिनो नरोऽस्माकं शत्रूञ्जयन्तु। ये विजयाय संचरन्ति ते नोऽस्मानलंकुर्वन्तु ॥३१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should kings and officers of the State do-is told.
O king! as the war-drum speaks aloud as battle's signal, in the same manner, get back these armies which have, big wings as their symbol and with their help drive away the armies of the enemies. Let our charioteers conquer our enemies. Let those brave persons adorn us, who go to distant places for victory.
