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वि दृ॒ळ्हानि॑ चिदद्रिवो॒ जना॑नां शचीपते। वृ॒ह मा॒या अ॑नानत ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi dṛḻhāni cid adrivo janānāṁ śacīpate | vṛha māyā anānata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि। दृ॒ळ्हानि॑। चि॒त्। अ॒द्रि॒ऽवः॒। जना॑नाम्। श॒ची॒ऽप॒ते॒। वृ॒ह। मा॒याः। अ॒ना॒न॒त॒ ॥९॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:45» मन्त्र:9 | अष्टक:4» अध्याय:7» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:6» अनुवाक:4» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य किसका निवारण करके किसको प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अद्रिवः) मेघों के करनेवाले सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (अनानत) शत्रुओं के समीप में नम्रता से रहित (शचीपते) प्रजा के स्वामिन् ! आप (मायाः) कपटों को (वृह) काटो और (चित्) भी (जनानाम्) मनुष्यों की (दृळ्हानि) निश्चित सेनाओं को करके शत्रुओं का (वि) विशेष करके नाश करिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - वह राजा, आचार्य्य वा अध्यापक उत्तम होवे, जो छल आदि दोषों का निवारण करके मनुष्यों को धर्म्म के आचरण से युक्त निरन्तर करे ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शत्रु माया का विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अद्रिवः) = वज्रवन् प्रभो! आप (जनानाम्) = लोगों के (दृढानि चित्) = दृढ़मूल भी कामक्रोध आदि शत्रुओं को (विवृह) = उखाड़ दीजिये। प्रभु की उपासना के होने पर इन काम-क्रोध आदि शत्रुओं के साथ प्रभु का संघर्ष होता है। उस संघर्ष में इन शत्रुओं का विनाश होता है। इनका जोर तो मेरे पर ही चल रहा था। [२] हे (शचीपते) = शक्तियों व प्रज्ञानों के स्वामिन् ! (अनानत) = शत्रुओं से न दबाये गये प्रभो! आप इन शत्रुओं की (मायाः) = मायाओं को (विवृह) = उन्मूलित कर दीजिये। इन आसुरभावों की मायाओं को विनष्ट करनेवाले होइये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु स्तोताओं के दृढमूल भी शत्रुओं का उन्मूलन करते हैं, इनकी मायाओं को विनष्ट करते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः किं निवार्य किं प्राप्नुयिरित्याह ॥

अन्वय:

हे अद्रिवोऽनानत शचीपते ! त्वं माया वृह चिदपि जनानां दृळ्हानि सैन्यानि सम्पाद्य शत्रून् वि वृह ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वि) (दृळ्हानि) निश्चितानि (चित्) अपि (अद्रिवः) मेघकरसूर्यवद्वर्त्तमान (जनानाम्) मनुष्याणाम् (शचीपते) प्रजास्वामिन् (वृह) उच्छिन्धि (मायाः) कपटानि (अनानत) शत्रूणां समीपे नम्रतारहित ॥९॥
भावार्थभाषाः - स एव राजाऽऽचार्योऽध्यापको वोत्तमः स्याद्यो छलादिदोषान्निवार्य्य मनुष्यान् धर्माचारान्त्सततं कुर्यात् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O bold and intrepidable ruler and protector of the people, lord of mighty action, you break the clouds and shake the mountains. Pray strengthen the strongholds of the people and uproot the wiles of the wicked.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should men remove and what should they attain-is told.

अन्वय:

O lord of your subjects! you are unbending before your foes and splendid like the sun, rend as under, all deceptions of the wicked people and destroy your enemies by organising strong armies of brave men.

भावार्थभाषाः - That king, preceptor or teacher is the best, who removes deceit and other evils and makes all men of righteous conduct.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो छळ इत्यादी दोषांचे निवारण करून माणसांना धार्मिक आचरणात प्रवृत्त करतो तोच राजा उत्तम आचार्य किंवा अध्यापक असतो. ॥ ९ ॥