त्वमेक॑स्य वृत्रहन्नवि॒ता द्वयो॑रसि। उ॒तेदृशे॒ यथा॑ व॒यम् ॥५॥
tvam ekasya vṛtrahann avitā dvayor asi | utedṛśe yathā vayam ||
त्वम्। एक॑स्य। वृ॒त्र॒ऽह॒न्। अ॒वि॒ता। द्वयोः॑। अ॒सि॒। उ॒त। ई॒दृशे॑। यथा॑। व॒यम् ॥५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर राजा और मन्त्रियों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शक्ति व ज्ञान का रक्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुना राज्ञाऽमात्यैश्च कथं वर्त्तितव्यमित्याह ॥
हे वृत्रहन् राजन् ! यथा वयमीदृश एकस्योत द्वयो रक्षका भवामस्तथा यतस्त्वमविताऽसि तस्मात् सत्कर्त्तव्योऽसि ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should a king and ministers behave is told.
O king you are slaughterer of the enemies, as sun is of the clouds, you are worthy of honor, as you are the protector of the helpless or of the officers of the State and ordinary subjects like us-engaged in this righteous dealing protecting all.
