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पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णां स्तो॑तॄ॒णां विवा॑चि। वाजे॑भिर्वाजय॒ताम् ॥२९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purūtamam purūṇāṁ stotṝṇāṁ vivāci | vājebhir vājayatām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒रु॒ऽतम॑म्। पु॒रू॒णाम्। स्तो॒तॄ॒णाम्। विऽवा॑चि। वाजे॑भिः। वा॒ज॒ऽय॒ताम् ॥२९॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:45» मन्त्र:29 | अष्टक:4» अध्याय:7» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:6» अनुवाक:4» मन्त्र:29


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर कौन उत्तम है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो वाणियाँ (वाजेभिः) अन्न आदिकों से (वाजयताम्) प्राप्त करानेवाले (पुरूणाम्) बहुत (स्तोतॄणाम्) विद्वानों के (विवाचि) अनेक प्रकार की सत्य अर्थ को प्रकाश करनेवाली वाणियाँ जिसमें उस व्यवहार में (पुरूतमम्) अतिशय बहुत विद्यायुक्त व्यवहार को प्राप्त होती हैं, वे हम लोगों को निश्चित प्राप्त हों ॥२९॥
भावार्थभाषाः - वे ही बहुतों में उत्तम हैं जो विद्या, विनय और धर्म्माचरण को प्राप्त हुए हैं ॥२९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'पुरू-तम' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पुरूणाम्) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (स्तोतृणाम्) = इन स्तोताओं की स्तुतिवाणियाँ, हे प्रभो! आपको व्याप्त करती हैं, जो आप (पुरूतमम्) = [पुरूणां तमयितारं] बहुत भी शत्रुओं के (ग्लापयिता) = क्षीण करनेवाले हैं। आपका स्तवन स्तोता के काम-क्रोध आदि शत्रुओं का विनाश करता है। [२] इसीलिए इन (वाजेभिः) = शक्तियों से (वाजयताम्) = अपने को शक्तिशाली बनाने की कामनावाले स्तोताओं की वाणियाँ (विवाचि) = विशिष्ट ज्ञान की वाणियों के उच्चारण के होने पर आपको ही स्तुत करती हैं। वस्तुत: आपका स्तवन ही इन विशिष्ट ज्ञान की वाणियों की प्राप्ति का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे शत्रुओं को अधिक से अधिक क्षीण करनेवाले हैं। हम प्रभु का ही स्तवन करें और विशिष्ट ज्ञान की वाणियों को व बलों को प्राप्त करें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः क उत्तम इत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! या गिरो वाजेभिर्वाजयतां पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि पुरूतमं प्राप्नुवन्ति ता अस्मानपि प्राप्नुवन्तु ॥२९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरूतमम्) अतिशयेन बहुविद्यम् (पुरूणाम्) बहूनाम् (स्तोतॄणाम्) विदुषाम् (विवाचि) विविधार्थसत्यार्थप्रकाशिका वाचो यस्मिन् व्यवहारे (वाजेभिः) अन्नादिभिः (वाजयताम्) प्रापयताम् ॥२९॥
भावार्थभाषाः - त एव बहुषूत्तमाः सन्ति ये विद्याविनयधर्म्माचरणं प्राप्ताः सन्ति ॥२९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the most ancient and eternal knowledge in the speech of the ancient celebrants of divinity, enlightening and energising humanity with the vital spirits of existence, reaching the primeval soul, come to us too, enlighten and energise us too.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Who is the best- is told.

अन्वय:

O men ! those speeches, which come to the great scholars-well-versed in many sciences, in the dealing- revealing the true meaning of various words of many enlightened devotees, honoring with food offerings etc. - may come to us also.

भावार्थभाषाः - Those are the best among many, who have acquired true knowledge, humility and righteous conduct.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्या, विनय व धर्माचरणाने वागतात तेच अत्यंत उत्तम असतात. ॥ २९ ॥