इ॒मा उ॑ त्वा शतक्रतो॒ऽभि प्र णो॑नुवु॒र्गिरः॑। इन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑ ॥२५॥
imā u tvā śatakrato bhi pra ṇonuvur giraḥ | indra vatsaṁ na mātaraḥ ||
इ॒माः। ऊँ॒ इति॑। त्वा॒। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। अ॒भि। प्र। नो॒नु॒वुः॒। गिरः॑। इन्द्र॑। व॒त्सम्। न। मा॒तरः॑ ॥२५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर धर्म्मात्मा राजा की सब प्रशंसा करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु स्तवन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्धर्म्मात्मानं सर्वे प्रशंसन्त्वित्याह ॥
हे शतक्रतो इन्द्र ! वत्सं मातरो न य इमा गिरस्त्वा प्र णोनुवुस्ता उ त्वमभि स्तुहि ॥२५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
All men should praise a righteous person-is told.
O king ! you are engaged in nourishing the subject, and endowed with infinite wisdom. Our words praise you, as mother cows call aloud for their calves. You should admire them.
