तद्वो॑ गाय सु॒ते सचा॑ पुरुहू॒ताय॒ सत्व॑ने। शं यद्गवे॒ न शा॒किने॑ ॥२२॥
tad vo gāya sute sacā puruhūtāya satvane | śaṁ yad gave na śākine ||
तत्। वः॒। गा॒य॒। सु॒ते। सचा॑। पु॒रु॒ऽहू॒ताय॑। सत्व॑ने। शम्। यत्। गवे॑। न। शा॒किने॑ ॥२२॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्य किसके लिये क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मिलकर प्रभु का गुणगान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्याः कस्मै किं कुर्य्युरित्याह ॥
हे मनुष्या ! यद्वः प्रशंसन्ति तच्छाकिने गवे न सुते सचा पुरुहूताय सत्वने स्युस्तान् हे इन्द्र ! त्वं शं गाय ॥२२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do and for whom-is told.
O men ! what praise is offered to you in this world, let that be for the truthful, man of pure heart, admired by many, like the mighty devotee, who sings the glory of God. O king ! you should also praise their glory.
