य एक॒ इत्तमु॑ ष्टुहि कृष्टी॒नां विच॑र्षणिः। पति॑र्ज॒ज्ञे वृष॑क्रतुः ॥१६॥
ya eka it tam u ṣṭuhi kṛṣṭīnāṁ vicarṣaṇiḥ | patir jajñe vṛṣakratuḥ ||
यः। एकः॑। इत्। तम्। ऊँ॒ इति॑। स्तु॒हि॒। कृ॒ष्टी॒नाम्। विऽच॑र्षणिः। पतिः॑। ज॒ज्ञे। वृष॑ऽक्रतुः ॥१६॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विचर्षणि वृषक्रतु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स राजा कीदृशो भवेदित्याह ॥
हे मनुष्य ! य एक इत्कृष्टीनां पतिर्विचर्षणिर्वृषक्रतुर्जज्ञे तमु स्तुहि ॥१६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should a king be-is further told.
O man! praise that king only, who endowed with strong intellect; is wonderful observer of men and their master.
