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यस्य॑ तीव्र॒सुतं॒ मदं॒ मध्य॒मन्तं॑ च॒ रक्ष॑से। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑ ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasya tīvrasutam madam madhyam antaṁ ca rakṣase | ayaṁ sa soma indra te sutaḥ piba ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑। ती॒व्र॒ऽसुत॑म्। मद॑म्। मध्य॑म्। अन्त॑म्। च॒। रक्ष॑से। अ॒यम्। सः। सोमः॑। इ॒न्द्र॒। ते॒। सु॒तः। पिब॑ ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:43» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:7» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:3» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) बल के देनेवाले (यस्य) जिसके (तीव्रसुतम्) तेजस्वियों से कर्म्मों द्वारा उत्पन्न किये (मदम्) आनन्द के देनेवाले (मध्यम्) मध्य में हुए (अन्तम्) और अन्त में वर्त्तमान की (च) भी (रक्षसे) रक्षा करते हो (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) उत्तम ओषधियों का रस (ते) आपके लिये (सुतः) उत्पन्न किया उसका आप (पिब) पान करिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे विद्यायुक्त राजन् ! आप वैसी ही ओषधियों को प्रकट करिये जिससे सब का सुख बढ़े ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीनों सवनों में सोमरक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] जीवन का प्रातः सवन प्रथम २४ वर्ष का है। इस सवन में सोम का सवन, वीर्यशक्ति का उत्पादन उत्कृष्ट रूप में होता है। उतना प्रबल उत्पादन जीवन के माध्यन्दिन सवन में नहीं रहता। और जीवन के तृतीय सवन में, ६९ से ११६ तक यह उत्पादन अत्यन्त शान्त-सा हो जाता है। तीनों ही सवनों में सोम अभिप्रेत है। सो कहते हैं कि (यस्य) = जिस सोम के (तीव्रसुतम्) = प्रातः सवन में होनेवाले तीव्र उत्पादनवाले (मदम्) = उल्लास को (रक्षसे) = तू रक्षित करता है, (च) = और (मध्यम्) = माध्यन्दिन सवन में होनेवाले (अन्तम्) = सायन्तन सवन में होनेवाले मद को रक्षित करता है । (अयं सः सोमः) = यह वह सोम, हे इन्द्र जितेन्द्रिय पुरुष ! (ते सुतः) = तेरे लिये उत्पन्न किया गया है । [२] (पिब) = इस सोम को तू अपने अन्दर ही पीनेवाला बन । यही सुरक्षित हुआ हुआ तुझे दीर्घजीवन प्राप्त करायेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जीवन के प्रातः, मध्याह्न व तृतीय में इस सोम का रक्षण सदा अभिप्रेत है । यह सुरक्षित सोम ही दीर्घजीवन का साधन बनता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राजा किं कुर्य्यादित्याह ॥

अन्वय:

हे इन्द्र ! त्वं यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्तं च रक्षसे सोऽयं सोमस्ते सुतस्तं त्वं पिब ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) (तीव्रसुतम्) तीव्रैस्तेजस्विभिः कर्मभिर्निष्पादितम् (मदम्) आनन्दकरम् (मध्यम्) मध्ये भवम् (अन्तम्) अवसानस्थम् (च) (रक्षसे) (अयम्) (सः) (सोमः) उत्तमौषधिरसः (इन्द्र) बलप्रद (ते) तुभ्यम् (सुतः) निष्पादितः (पिब) ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् राजँस्त्वं तादृशान्येवौषधानि प्रकटीकुरु यैः सर्वेषां सुखं वर्धेत ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord ruler, this is that soma, the power and glory of the yajnic order, distilled and refined in your honour, the brilliant and pure spirit of which in the essence you protect and promote in the beginning, in the middle and at the end of its completion. Pray drink of it to your heart’s content and rejoice in the splendour and ecstasy of it.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should a king do—is further told.

अन्वय:

O giver of strength Indra ! drink this Soma (juice of good drugs and herbs etc.) which has been pressed out for you, whose gladdening draught, extracted with splendid acts you guard, in the middle and end.

भावार्थभाषाः - O enlightened king! you should manifest such medicines, as increase the happiness of all.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे विद्यायुक्त राजा ! तू अशीच औषधी निष्पादित कर. ॥ २ ॥