वांछित मन्त्र चुनें

प्रत्य॑स्मै॒ पिपीष॑ते॒ विश्वा॑नि वि॒दुषे॑ भर। अ॒रं॒ग॒माय॒ जग्म॒येऽप॑श्चाद्दध्वने॒ नरे॑ ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

praty asmai pipīṣate viśvāni viduṣe bhara | araṁgamāya jagmaye paścāddaghvane nare ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रति॑। अ॒स्मै॒। पिपी॑षते। विश्वा॑नि। वि॒दुषे॑। भ॒र॒। अ॒र॒म्ऽग॒माय॑। जग्म॑ये। अप॑श्चात्ऽदध्वने। नरे॑ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:42» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:7» वर्ग:14» मन्त्र:1 | मण्डल:6» अनुवाक:3» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चार ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! आप (जग्मये) विज्ञान की अधिकता के लिये (अपश्चाद्दध्वने) उत्तम व्यवहारों में आगे चलने तथा (अरङ्गमाय) विद्या के पार जाने और (पिपीषते) पान करने की इच्छा करनेवाले (विदुषे) यथार्थवक्ता विद्वान् के लिये और (अस्मै) इस (नरे) अग्रणी मनुष्य के लिये (विश्वानि) सम्पूर्ण उत्तम वस्तुओं को (भर) धारण करिये और यह भी आपके लिये इनको (प्रति) धारण करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो राजा विद्वानों के लिये सम्पूर्ण धन वा सामर्थ्य को धारण करता है और जो विद्वान् राजा आदि के हित के लिये प्रयत्न करते हैं, वे सर्वदा उन्नत होते हैं ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गतिशीलता व सोमरक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (अस्मै) = इस उपासक के लिये (प्रतिभर) = अंग-प्रत्यंग में सोम का भरण करिये। जो उपासक (पिपीषते) = सोम का पान करना चाहता है तथा (विश्वानि विदुषे) = सब वेद्य वस्तुओं को जानने के लिये यत्नशील होता है। इसके लिये सोम का भरण करिये। [२] उस उपासक के लिये सोम का रक्षण करिये जो (अरङ्गमाय) = खूब क्रियाशील है, (जग्मये) = यज्ञादि उत्तम कर्मों में जाने के स्वभाववाला है, (अपश्चाद्दध्वने) = कभी पीछे गतिवाले न होकर सदा अग्रगतिवाला है तथा (नरे) = अपने को सदा उन्नतिपथ पर ले चलनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये सर्वोत्तम साधन सदा उत्तम कर्मों में लगे रहना ही है ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजप्रजाजनाः परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥

अन्वय:

हे विद्वन् राजंस्त्वं जग्मयेऽपश्चाद्दध्वनेऽरङ्गमाय पिपीषते विदुषेऽस्मै नरे विश्वानि भराऽयमपि तुभ्यमेतानि प्रति भरतु ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रति) (अस्मै) (पिपीषते) पातुमिच्छवे (विश्वानि) सर्वाण्युत्तमानि वस्तूनि (विदुषे) आप्ताय विपश्चिते (भर) धर (अरङ्गमाय) यो विद्यायां अरं पारं गच्छति तस्मै (जग्मये) विज्ञानाधिक्याय (अपश्चाद्दध्वने) उत्तमेषु व्यवहारेष्वग्रगामिने (नरे) नायकाय ॥१॥
भावार्थभाषाः - यो राजा विद्वदर्थे सर्वं धनं सामर्थ्यं वा धरति ये च विद्वांसो राजादिहिताय प्रयतन्ते ते सर्वदोन्नता जायन्ते ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, ruler and patron of knowledge and culture, provide all facilities of the world for this bold and courageous leading scholar thirsting for knowledge and constantly going forward to reach the expansive bounds of his subject, never tarrying, never looking back.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should the officers and people of the State deal with one another is told.

अन्वय:

O highly learned king! bring for the advancement of knowledge all desirable and necessary articles to this enlightened and reliable person, who is well-versed in many sciences, who desires to protect us and is a great leader in all good dealings. Let him also give good things to you in return, for your joy.

भावार्थभाषाः - That king, who uses his wealth and power for the sake of the enlightened persons and those scholars who endeavor to bring about the welfare of the king and his subjects, always become exalted.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात इंद्र, राजा, विद्वान व प्रजा यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - जो राजा विद्वानासाठी संपूर्ण धन किंवा सामर्थ्य ग्रहण करतो व जे विद्वान राजाच्या हितासाठी प्रयत्न करतात ते सदैव उन्नत होतात. ॥ १ ॥