प्रत्य॑स्मै॒ पिपीष॑ते॒ विश्वा॑नि वि॒दुषे॑ भर। अ॒रं॒ग॒माय॒ जग्म॒येऽप॑श्चाद्दध्वने॒ नरे॑ ॥१॥
praty asmai pipīṣate viśvāni viduṣe bhara | araṁgamāya jagmaye paścāddaghvane nare ||
प्रति॑। अ॒स्मै॒। पिपी॑षते। विश्वा॑नि। वि॒दुषे॑। भ॒र॒। अ॒र॒म्ऽग॒माय॑। जग्म॑ये। अप॑श्चात्ऽदध्वने। नरे॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चार ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्त्ताव करे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गतिशीलता व सोमरक्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजप्रजाजनाः परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्याह ॥
हे विद्वन् राजंस्त्वं जग्मयेऽपश्चाद्दध्वनेऽरङ्गमाय पिपीषते विदुषेऽस्मै नरे विश्वानि भराऽयमपि तुभ्यमेतानि प्रति भरतु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should the officers and people of the State deal with one another is told.
O highly learned king! bring for the advancement of knowledge all desirable and necessary articles to this enlightened and reliable person, who is well-versed in many sciences, who desires to protect us and is a great leader in all good dealings. Let him also give good things to you in return, for your joy.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, राजा, विद्वान व प्रजा यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
