इन्द्र॒ पिब॒ तुभ्यं॑ सु॒तो मदा॒याव॑ स्य॒ हरी॒ वि मु॑चा॒ सखा॑या। उ॒त प्र गा॑य ग॒ण आ नि॒षद्याथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते वयो॑ धाः ॥१॥
indra piba tubhyaṁ suto madāyāva sya harī vi mucā sakhāyā | uta pra gāya gaṇa ā niṣadyāthā yajñāya gṛṇate vayo dhāḥ ||
इन्द्र॑। पिब॑। तुभ्य॑म्। सु॒तः। मदा॑य। अव॑। स्य॒। हरी॒ इति॑। वि। मु॒च॒। सखा॑या। उ॒त। प्र। गा॒य॒। ग॒णे। आ। नि॒ऽसद्य। अथ॑। य॒ज्ञाय॑। गृ॒ण॒ते। वयः॑। धाः॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
जीव का मौलिक कर्त्तव्य -
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राज्ञा किं कर्तव्यमित्याह ॥
हे इन्द्र ! यस्तुभ्यं मदाय सुतः सोमोऽस्ति तं पिब तेनाऽव स्योत हरी इव वि मुचा सखाया प्र गाय गणे निषद्याथा गृणते यज्ञाय वयश्चाऽऽधाः ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should a king do-is told.
O king! drink that Soma (juice of Soma the moon creeper and other invigorating herbs) which is extracted for your joy. Put an end to your suffering thereby and decide your duty. Praise those men of the State and the subjects, who like the two joint horses remove miseries, being friends to one another. Being seated in the assembly of the enlightened persons, uphold desirable long life for the admirer of the Vidya (true knowledge) and Dharma (righteousness, duty) and the person who is ever truthful.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, सोम, औषधी, राजा व प्रजा यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
