सं च॒ त्वे ज॒ग्मुर्गिर॑ इन्द्र पू॒र्वीर्वि च॒ त्वद्य॑न्ति वि॒भ्वो॑ मनी॒षाः। पु॒रा नू॒नं च॑ स्तु॒तय॒ ऋषी॑णां पस्पृ॒ध्र इन्द्रे॒ अध्यु॑क्था॒र्का ॥१॥
saṁ ca tve jagmur gira indra pūrvīr vi ca tvad yanti vibhvo manīṣāḥ | purā nūnaṁ ca stutaya ṛṣīṇām paspṛdhra indre adhy ukthārkā ||
सम्। च॒। त्वे इति॑। ज॒ग्मुः। गिरः॑। इ॒न्द्र॒। पू॒र्वीः। वि। च॒। त्वत्। य॒न्ति॒। वि॒ऽभ्वः॑। म॒नी॒षाः। पु॒रा। नू॒नम्। च॒। स्तु॒तयः॑। ऋषी॑णाम्। प॒स्पृ॒ध्रे। इन्द्रे॑। अधि॑। उ॒क्थ॒ऽअ॒र्का ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले चौंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (पूर्वीः गिरः) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी जानेवाली ये ज्ञान की वाणियाँ सदा (त्वे च) = आप में ही (संजग्मुः) = संगत होती हैं। (च) = और (विभ्वः) = ये विस्तृतव्यापक सब विषयों का व्यापन करनेवाली (मनीषा:) = मतियाँ- ज्ञान (त्वद् वियन्ति) = आप से ही बाहिर आते हैं। आप ही इनके स्रोत हैं। [२] (पुरा) = पहले (नूनं च) = और अब भी अर्थात् सदा (ऋषीणां स्तुतयः) = तत्त्वद्रष्टाओं से की जानेवाली स्तुतियाँ तथा (उक्थार्का) = [उक्थ अर्का] स्तुति के साधनभूत मन्त्र (इन्द्रे अधि) = उस प्रभु में ही (पस्पृध्रे) = स्पर्धावाले होते हैं । अर्थात् एक से एक आगे बढ़कर ये ऋषि उस प्रभु का स्तवन करनेवाले होते हैं ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजा किं कुर्यादित्याह ॥
हे इन्द्र ! ये त्वे त्वत् पूर्वीर्गिरश्च यन्ति शुभैश्च गुणैः सं जग्मुर्विभ्वो मनीषाः सन्तः परस्परं वि यन्ति। ऋषीणां पुरा स्तुतयश्च नूनं पस्पृध्रे, इन्द्र उक्थार्काऽधि पस्पृध्रे ते सुखमाप्नुवन्ति ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should a king do-is told.
O Indra ! (giver of knowledge), those persons enjoy happiness, who receive from you ancient good and refined words and are thereby united with noble virtues; those who pervading good virtues (being very virtuous) controllers of mind and active, approach each other variously. The praises of the Rishi-knowers of the meanings of the Vedas and true preachers, from ancient days compete with another in extolling the Lord. Their admirable and venerable speeches all praise Indra- the Lord of the world.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजा व प्रजा यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
