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आ यस्मि॒न्हस्ते॒ नर्या॑ मिमि॒क्षुरा रथे॑ हिर॒ण्यये॑ रथे॒ष्ठाः। आ र॒श्मयो॒ गभ॑स्त्योः स्थू॒रयो॒राध्व॒न्नश्वा॑सो॒ वृष॑णो युजा॒नाः ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yasmin haste naryā mimikṣur ā rathe hiraṇyaye ratheṣṭhāḥ | ā raśmayo gabhastyoḥ sthūrayor ādhvann aśvāso vṛṣaṇo yujānāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। यस्मि॑न्। हस्ते॑। नर्याः॑। मि॒मि॒क्षुः। आ। रथे॑। हि॒र॒ण्यये॑। र॒थे॒ऽस्थाः। आ। र॒श्मयः॑। गभ॑स्त्योः। स्थू॒रयोः॑। आ। अध्व॑न्। अश्वा॑सः। वृष॑णः। यु॒जा॒नाः ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:29» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:3» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! ऐश्वर्य करनेवाले के (यस्मिन्) जिस (हस्ते) हस्त में (रश्मयः) किरणों के समान (आ) सब ओर से (मिमिक्षुः) सिञ्चन करते सम्बन्ध करते हैं तथा (नर्याः) मनुष्यों के लिये हितकारक शस्त्र और अस्त्र जिसके (हिरण्यये) तेज के विकार से बने हुए (रथे) रथ में और (रथेष्ठाः) रथ पर स्थित होनेवाले जन और (स्थूरयोः) स्थूल (गभस्त्योः) बाहुओं के मध्य में शस्त्र और अस्त्र हैं तथा जिसके वाहनों में (वृषणः) बलिष्ठ (अश्वासः) घोड़ों के समान बड़े बिजुली आदि पदार्थ (आ) सब ओर से (युजानाः) युक्त (अध्वन्) मार्ग में यानों को (आ) लाते हैं, वे सुखों से जनों का (आ) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा शस्त्र और अस्त्र के जाननेवाले, श्रेष्ठ धार्मिक, शूर तथा विमान आदि वाहनों के बनानेवाले शिल्पियों और बिजुली आदि की विद्या को जाननेवाले विद्वानों का सत्कार करके रक्षा करता है, उसी के सूर्य के किरणों के समान यश बढ़ते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'हिरण्यय रथ का सारथि' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (हस्ते) = [हस्त: हन्तेः] शत्रुओं का हनन करनेवाले (यस्मिन्) = जिस इन्द्र में (नर्या:) = नरहितकारी धन (आमिमिक्षुः) = आपूरित होते हैं, अर्थात् जो प्रभु वासनाओं के संहार के द्वारा उपासक को उत्कृष्ट धन प्राप्त कराते हैं, वे प्रभु (हिरण्यये रथे:) = इस प्रभु कृपा से ही ज्योतिर्मय बने शरीर-रथ में (रथेष्ठाः) = सारथि होते हैं। अपने उपासक के शरीर-रथ का सञ्चालन प्रभु करते हैं। [२] उस समय (रश्मयः) = इस शरीरथ के घोड़ों [इन्द्रियाश्वों] की लगामें (स्थूरयोः गृभस्त्योः) = उस सारथि के स्थूल, मज़बूत व दृढ़ हाथों में (आ) = [ यम्यन्ते ] होती हैं। (अध्वन्) = इस जीवनयात्रा के मार्ग में (अश्वासः) = इन्द्रियाश्व (वृषणः) = शक्तिशाली होते हैं और (युजाना:) = शरीर-रथ में जुते होते हैं। अर्थात् उपासक का जीवन सतत क्रियाशीलता का होता है, वहाँ अकर्मण्यता नहीं होती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के हाथों में सब नरहितकारी धन विद्यमान हैं। ये प्रभु ही इस शरीर-रथ के मार्ग पर ले चलनेवाले होते सारथि बनते हैं। उस समय इन्द्रियाश्व भटकते नहीं और शरीर-रथ को चलने वाले होते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स राजा किं कुर्यादित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! इन्द्रस्य यस्मिन् हस्ते रश्मय आ मिमिक्षुरिव नर्याः शस्त्रास्त्राणि यस्य हिरण्यये रथे रथेष्ठाः स्थूरयोर्गभस्त्योः शस्त्रास्त्राणि सन्ति यस्य यानेषु वृषणोऽश्वास आ युजाना अध्वन् यानान्या गमयन्ति ते सुखैर्जनाना मिमिक्षुः ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (यस्मिन्) (हस्ते) (नर्याः) नृभ्यो हितानि (मिमिक्षुः) सिञ्चन्ति सम्बध्नन्ति (आ) (रथे) (हिरण्यये) तेजोमये (रथेष्ठाः) ये रथे तिष्ठन्ति ते (आ) (रश्मयः) किरणा इव (गभस्त्योः) बाह्वोर्मध्ये (स्थूरयोः) स्थूलयोः। अत्र वर्णव्यत्येन लस्य स्थाने रः। (आ) (अध्वन्) अध्वनि मार्गे (अश्वासः) अश्वा इव महान्तो विद्युदादयः पदार्थाः (वृषणः) बलिष्ठाः (युजानाः) युक्ताः ॥२॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यो राजा शस्त्रास्त्रविदो वरान् धार्मिकाञ्छूरान् विमानादियाननिर्मातॄञ्छिल्पिनो विद्युदादिविद्याविदुषः सत्कृत्य रक्षति तस्यैव सूर्यरश्मय इव यशांसि प्रथन्ते ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra in whose hands are all the gifts of life for mankind rides the golden chariot of the cosmos, holding reins of the world in his mighty hands, controlling the potent forces of nature like horses on the course of time and destiny.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should a king do-is again told.

अन्वय:

O men ! in the hands of which Indra (king) there are reins in whose splendid car there are seated many heroes in whose strong arms there are arms and missiles like the rays of the sun which are useful for men and in whose vehicles great articles like electricity etc. are harnessed like mighty horses which lead on towards the path, such a king can bestow happiness upon the people.

भावार्थभाषाः - The reputation of that king spreads everywhere like the rays of the sun who keeps with honor good and righteous heroes, who know the use of the aircrafts and other vehicles and scientists who know well the science of electricity and various other sciences.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जो राजा शस्त्र-अस्त्र जाणणाऱ्या, श्रेष्ठ, धार्मिक, शूर, विमान इत्यादी निर्माण करणाऱ्या कारागिरांचा व विद्युत विद्या जाणणाऱ्या विद्वानांचा सत्कार करून रक्षण करतो त्याचे सूर्यकिरणांप्रमाणे यश वाढते. ॥ २ ॥