सु॒त इत्त्वं निमि॑श्ल इन्द्र॒ सोमे॒ स्तोमे॒ ब्रह्म॑णि श॒स्यमा॑न उ॒क्थे। यद्वा॑ यु॒क्ताभ्यां॑ मघव॒न्हरि॑भ्यां॒ बिभ्र॒द्वज्रं॑ बा॒ह्वोरि॑न्द्र॒ यासि॑ ॥१॥
suta it tvaṁ nimiśla indra some stome brahmaṇi śasyamāna ukthe | yad vā yuktābhyām maghavan haribhyām bibhrad vajram bāhvor indra yāsi ||
सु॒ते। इत्। त्वम्। निऽमि॑श्लः। इ॒न्द्र॒। सोमे॑। स्तोमे॑। ब्रह्म॑णि। श॒स्यमा॑ने। उ॒क्थे। यत्। वा॒। यु॒क्ताभ्या॑म्। म॒घ॒ऽव॒न्। हरि॑ऽभ्याम्। बिभ्र॑त्। वज्र॑म्। बा॒ह्वोः। इ॒न्द्र॒। यासि॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब दश ऋचावाले तेईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रविषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु कब मिलते हैं ?
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेन्द्रविषयमाह ॥
हे इन्द्र ! यस्त्वं स्तोमे ब्रह्मणि निमिश्लः सोमे सुते शस्यमान उक्थे युक्ताभ्यां हरिभ्यां बाह्वोर्वज्रं बिभ्रद् यासि यद्वा हे मघवन्निन्द्र ! त्वमायासि स त्वमित् सत्कर्त्तव्योऽसि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties and attributes of Indra (king) are told.
O Indra-killer of the foes! you are worthy of respect, as you become prosperous king, on the occasion of your praise on acquisition of the admirable wealth that is worth bearing or speaking. Endowed with that wealth and accomplished by two men who take away sins from you (by their good teachings) (that is) teachers and preachers, you bear the thunderbolt-like powerful weapon in your hands.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, विद्वान, राजा व प्रजा यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
