म॒हाँ इन्द्रो॑ नृ॒वदा च॑र्षणि॒प्रा उ॒त द्वि॒बर्हा॑ अमि॒नः सहो॑भिः। अ॒स्म॒द्र्य॑ग्वावृधे वी॒र्या॑यो॒रुः पृ॒थुः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत् ॥१॥
mahām̐ indro nṛvad ā carṣaṇiprā uta dvibarhā aminaḥ sahobhiḥ | asmadryag vāvṛdhe vīryāyoruḥ pṛthuḥ sukṛtaḥ kartṛbhir bhūt ||
म॒हान्। इन्द्रः॑। नृ॒ऽवत्। आ। च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः। उ॒त। द्वि॒ऽबर्हाः॑। अ॒मि॒नः। सहः॑ऽभिः। अ॒स्म॒द्र्य॑क्। व॒वृ॒धे॒। वी॒र्या॑य। उ॒रुः। पृ॒थुः। सुऽकृ॑तः। क॒र्तृऽभिः॑। भू॒त् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तेरह ऋचावाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब सूर्य कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्विवर्हाः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ सूर्यः कीदृशोऽस्तीत्याह ॥
हे मनुष्या ! यो महानिन्द्रश्चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनोऽस्मद्र्यगुरुः पृथुः सुकृतो भूत् सहोभिः कर्तृभिस्सह वीर्याय नृवदा वावृधे तं विज्ञायेष्टसिद्धिं कुरुत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The characteristics of sun is told.
O men ! accomplish your desirable works by knowing the nature of Indra (sun/power) which is great and pervading human and other beings in the form of electricity, which grows by the firmament and air. It is non-violent, vast and extensive, and generated well. It grows for generating force that can do many works like a man.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, राजा व प्रजा यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
