स म॒ज्मना॒ जनि॑म॒ मानु॑षाणा॒मम॑र्त्येन॒ नाम्नाति॒ प्र स॑र्स्रे। स द्यु॒म्नेन॒ स शव॑सो॒त रा॒या स वी॒र्ये॑ण॒ नृत॑मः॒ समो॑काः ॥७॥
sa majmanā janima mānuṣāṇām amartyena nāmnāti pra sarsre | sa dyumnena sa śavasota rāyā sa vīryeṇa nṛtamaḥ samokāḥ ||
सः। म॒ज्मना॑। जनि॑म। मानु॑षाणाम्। अम॑र्त्येन। नाम्ना॑। अति॑। प्र। स॒र्स्रे॒। सः। द्यु॒म्नेन॑। सः। शव॑सा। उ॒त। रा॒या। सः। वी॒र्ये॑ण। नृऽत॑मः। सम्ऽओ॑काः ॥७॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर राजा को क्यो करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्युम्न-शवस्-धन व वीर्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुना राज्ञा किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे राजन् ! यथाऽयं भृत्यो मज्मना स द्युम्नेन स शवसा स रायोत स वीर्य्येण मानुषाणाममर्त्येन नाम्ना जनिम प्रादुर्भावमति प्र सर्स्रे सः समोका नृतमः स्यात्तथा विधेहि ॥७॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should a king do is further told.
O king ! you should ordain in such a manner that this Public Servant surpasses other men in his might, in his wealth or good reputation, in extraordinary strength, in riches and in velour. Let his name live for ever. Let him become the best among men, living in the same place with others lovingly.
