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स्व॒नो न वोऽम॑वान्रेजय॒द्वृषा॑ त्वे॒षो य॒यिस्त॑वि॒ष ए॑व॒याम॑रुत्। येना॒ सह॑न्त ऋ॒ञ्जत॒ स्वरो॑चिषः॒ स्थार॑श्मानो हिर॒ण्ययाः॑ स्वायु॒धास॑ इ॒ष्मिणः॑ ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

svano na vo mavān rejayad vṛṣā tveṣo yayis taviṣa evayāmarut | yenā sahanta ṛñjata svarociṣaḥ sthāraśmāno hiraṇyayāḥ svāyudhāsa iṣmiṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्व॒नः। न। वः॒। अम॑ऽवान्। रे॒ज॒य॒त्। वृषा॑। त्वे॒षः। य॒यिः। त॒वि॒षः। ए॒व॒याम॑रुत्। येन॑। सह॑न्तः। ऋ॒ञ्जत॑। स्वऽरो॑चिषः। स्थाःऽर॑श्मानः। हि॒र॒ण्ययाः॑। सु॒ऽआ॒यु॒धासः॑। इ॒ष्मिणः॑ ॥५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:87» मन्त्र:5 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:33» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वान् राजाजन कैसे होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! वह (वः) आप लोगों के मध्य में (स्वनः) शब्द के (न) समान (अमवान्) गृहवाला (वृषा) बलिष्ठ और (त्वेषः) प्रकाशवान् (तविषः) बल से (ययिः) प्राप्त होनेवाला (एवयामरुत्) बुद्धिमान् मनुष्य व्यवहारों को (रेजयत्) कंपित कराता है (येना) जिस पुरुष से (सहन्तः) सहन करनेवाले (स्वरोचिषः) अपने से प्रकाश जिनका ऐसे और (स्थारश्मानः) स्थिर किरणों के सदृश व्यवहार जिनके तथा (हिरण्ययाः) तेजस्वरूप (स्वायुधासः) अपने आयुधोंवाले और (इष्मिणः) बहुत प्रकार की इच्छावाले जन आप लोग अपने प्रयोजनों को (ऋञ्जत) सिद्ध करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो प्रकाशित धर्म्मयुक्त व्यवहारवाले तथा शम, दम आदि से युक्त, तेजस्वी, बलवाले और युद्धविद्या में कुशल होवें, वे ही विजयी होते हैं ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वरोचियः-स्थारश्मानः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मरुतो) = प्राणो ! (वः) = आपका रेचन व पूरण के समय होनेवाला (स्वनः) = शब्द (न रेजयत्) = मुझे कम्पित करनेवाला न हो । अर्थात् मैं इस प्राणसाधना में बहुत हिलता-जुलता ही न रहूँ । 'स्थिरसुखमासनम्' इस योगसूत्र के अनुसार स्थिरता से आसन पर आसीन रहूँ। यह आपका स्वनः (अमवान्) = प्रबल है, (वृषा) = शक्ति का सेचन करनेवाला है, (त्वेषः) = दीप्त है, (ययिः) = तुझे गतिशील बनानेवाला है, मेरे में स्फूर्ति व क्रियाशीलता को उत्पन्न करनेवाला है। (तविष:) = बल का वर्धक है। [२] प्राणों के इस प्राणसाधना में होनेवाले 'इं-स' इस अव्यक्त ध्वनिरूप (येन) = स्वन से जिस ही (एवयामरुत्) = मार्ग पर चलनेवाले प्राणसाधक पुरुष (सहन्तः) = शत्रुओं का अभिभव करते हुए (ऋञ्जत) = अपने जीवन को प्रसाधित व अलंकृत करते हैं। (स्वरोचिषः) = आत्मदीप्तिवाले बनते हैं, (स्थारश्मानः) = स्थिर ज्ञानरश्मियोंवाले होते हैं, (हिरण्ययाः) = ज्योतिर्मय जीवनवाले बनते हैं, (स्वायुधासः) = उत्तम 'इन्द्रिय, मन व बुद्धि' रूप आयुधोंवाले होते हैं और (इष्मिणः) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त करके [इष् प्रेरणे] खूब गतिशील जीवनवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना में स्थिरता से प्रवृत्त हुए हुए हम शत्रुओं का अभिभव करके ज्ञान विज्ञान का वर्धन करते हुए जीवन को प्रशस्त 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' वाला बनायें ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वांसो राजजनाः कीदृशा भवन्तीत्याह ॥५॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! स वः स्वनो नाऽमवान् वृषा त्वेषस्तविषो ययिरेवयामरुत् व्यवहारान् रेजयत् येना सहन्तः स्वरोचिषः स्थारश्मानो हिरण्ययाः स्वायुधास इष्मिणो जना यूयं स्वप्रयोजनान्यृञ्जत ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (स्वनः) शब्दः (न) इव (वः) युष्माकम् (अमवान्) गृहवन् (रेजयत्) कम्पयते (वृषा) बलिष्ठः (त्वेषः) दीप्तिमान् (ययिः) याता (तविषः) बलात् (एवयामरुत्) (येना) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (सहन्तः) सोढारः (ऋञ्जत) प्रसाध्नुत (स्वरोचिषः) स्वयं रोची रोचनमेषान्ते (स्थारश्मानः) स्थिरा रश्मानः किरणा इव व्यवहारा येषान्ते (हिरण्ययाः) तेजोमयाः (स्वायुधासः) स्वकीयान्यायुधानि येषान्ते (इष्मिणः) बहुविधमिष्मेच्छा येषान्ते ॥५॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । ये प्रकाशितधर्म्यव्यवहारा शमदमान्वितास्तेजस्विनो बलिष्ठा युद्धविद्याकुशलाः स्युस्त एव विजयिनो भवन्ति ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the rumble of the Big Bang of creation, may the lord of the Maruts, Vishnu, shake you, O men and women of the world, shine you and inspire you, the lord omnipresent, generous, self-refulgent, omnipotent, everfelt in the heart, by virtue of whom the Maruts, natural energies and pioneers of humanity shining by themselves, unshaken yet dynamic like rays of the sun, golden gloried, self-armed and nobly ambitious, stand the challenges of existence and achieve their end and aim.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should be the qualities of highly learned officers of the state is told.

अन्वय:

O men! a person who has good house like your good sound, who is powerful, splendid, going with power and endowed with knowledge transacts dealings, by which men who are of forbearing nature, self luminous, whose dealings are firm like the rays of the sun, full of splendor, impetuous and well weaponed, and having many noble desires accomplishes his works.

भावार्थभाषाः - Those persons only achieve victory whose righteous dealings are manifest, who are endowed with peace and self-control full of splendor, mighty and are experts in the science of warfare.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे धर्मयुक्त व्यवहाराने प्रसिद्ध शमदम इत्यादींनी युक्त, तेजस्वी, बलवान व युद्धविद्येत कुशल असतात तेच विजयी होतात. ॥ ५ ॥