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ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामिन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। पती॑ तु॒रस्य॒ राध॑सो वि॒द्वांसा॒ गिर्व॑णस्तमा ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā vām eṣe rathānām indrāgnī havāmahe | patī turasya rādhaso vidvāṁsā girvaṇastamā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता। वा॒म्। एषे॑। रथा॑नाम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑। ह॒वा॒म॒हे॒। पती॒ इति॑। तु॒रस्य॑। राध॑सः। वि॒द्वांसा॑। गिर्व॑णःऽतमा ॥४॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:86» मन्त्र:4 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (रथानाम्) वाहनों और (तुरस्य) शीघ्र सुखकारक (राधसः) धन के (पती) पालन करनेवाले (गिर्वणस्तमा) अतिशय उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी का सेवन करते हुए (विद्वांसा) विद्या से युक्त (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (वाम्) और आप दोनों को (एषे) प्राप्त होने के लिये हम लोग (हवामहे) प्राप्त होने की इच्छा करें (ता) उन दोनों को आप लोग भी प्राप्त होओ ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली के सदृश श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त विद्वानों के सङ्ग से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर प्रजाओं में मित्र के सदृश वर्त्ताव करें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पती तुरस्य राधसः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के देवो! (ता वाम्) = उन आप दोनों को (स्थानां एषे) = शरीररथों के मार्ग पर प्रेरित करने के लिये (हवामहे) = पुकारते हैं। हमारे इस शरीर-रथ में इन्द्र और अग्नि की स्थिति के होने पर, शक्ति व ज्ञान के प्रकाश के होने पर जीवन यात्रा सुन्दरता से पूर्ण होती है। हमारा यह शरीर-रथ न टूटता है, न भटकता है। इन्द्र इसे दृढ़ बनाता है और अग्नि इसे प्रकाश दिखाता है। [२] ये इन्द्र और अग्नि (तुरस्य) = शत्रुओं का संहार करनेवाले (राधसः) = ऐश्वर्य के (पती) = स्वामी हैं। अर्थात् ये हमें उस ऐश्वर्य को प्राप्त कराते हैं, जो हमें विषयों में फँसानेवाला नहीं होता। ये इन्द्र और अग्नि (विद्वांसा) = ज्ञानी हैं, अपने कर्त्तव्यों को समझते हैं और (गिर्वणस्तमा) = अधिकसे-अधिक ज्ञान की वाणियों का सम्भजन करनेवाले हैं। इन्द्र व अग्नि से हमारा जीवन ज्ञान-प्रधान बनता है, हमारा सारा रिक्त समय स्वाध्याय के लिये अर्पित होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बल व प्रकाश के तत्त्व हमें उस ऐश्वर्य को प्राप्त कराते हैं, जो हमें विषयों में नहीं फँसाता। इनके होने पर हमारा जीवन ज्ञान प्रधान बना रहता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यौ रथानां तुरस्य राधसः पती गिर्वणस्तमा विद्वांसेन्द्राग्नी वामेषे वयं हवामहे ता यूयमपि प्राप्नुत ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ता) तौ (वाम्) युवाम् (एषे) एतुम् (रथानाम्) (इन्द्राग्नी) वायुविद्युतौ (हवामहे) प्राप्तुमिच्छेम (पती) पालकौ (तुरस्य) शीघ्रं सुखकरस्य (राधसः) धनस्य (विद्वांसा) विद्यायुक्तौ (गिर्वणस्तमा) अतिशयेन सुशिक्षितां वाचं सेवमानौ ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्वायुविद्युद्वच्छुभगुणव्यापिनां विदुषां सङ्गेन विद्याशिक्षे प्राप्य प्रजासु मित्रवद्वर्त्तितव्यम् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Agni, most adorable scholars of the science of terrestrial and celestial energy, heat, light and electricity, and masters of fast automotion and material prosperity, we invoke you both for the speed and movement of chariots for success.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The scholar's duties are described.

अन्वय:

O men ! we desire to acquire the knowledge of the air and electricity (energy. Ed.) which are protectors of the various charming vehicles leading wealth to quick happiness. We invoke also the teachers and preachers, who are benevolent like the air and electricity, who are endowed with much knowledge and who use most cultured or refined speech.

भावार्थभाषाः - Men should receive knowledge and good education by the association of the enlightened persons who pervade in good virtues (knowledge. Ed. ) related to air and electricity. Thereafter they should deal with all people like friends.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी वायू व विद्युतप्रमाणे श्रेष्ठ गुणांनी व्याप्त असलेल्या विद्वानांच्या संगतीने विद्या व शिक्षण प्राप्त करून प्रजेमध्ये मित्राप्रमाणे वर्तन करावे. ॥ ४ ॥