तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॒ भोज॑नम्। श्रेष्ठं॑ सर्व॒धात॑मं॒ तुरं॒ भग॑स्य धीमहि ॥१॥
tat savitur vṛṇīmahe vayaṁ devasya bhojanam | śreṣṭhaṁ sarvadhātamaṁ turam bhagasya dhīmahi ||
तत्। स॒वि॒तुः। वृ॒णी॒म॒हे॒। व॒यम्। दे॒वस्य॑। भोज॑नम्। श्रेष्ठ॑म्। स॒र्व॒ऽधात॑मम्। तुर॑म्। भग॑स्य। धी॒म॒हि॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नव ऋचावाले बयासीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
देवस्य भोजनम्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः क उपास्य इत्याह ॥
हे मनुष्या ! वयं भगस्य सवितुर्देवस्य यच्छ्रेष्ठं भोजनं सर्वधातमं तुरं वृणीमहे धीमहि तद्यूयं स्वीकुरुत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should be adored by men is told.
O men ! as we accept and uphold the Power of God which is destroyer of ignorance and other evils. It is nourisher, the best and the greatest upholder of all, and of God who is Indwelling spirit, Illuminator of all and Lord of the world. So you should' also do.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात ईश्वर व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची या पूर्वीच्या सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
