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तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॒ भोज॑नम्। श्रेष्ठं॑ सर्व॒धात॑मं॒ तुरं॒ भग॑स्य धीमहि ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tat savitur vṛṇīmahe vayaṁ devasya bhojanam | śreṣṭhaṁ sarvadhātamaṁ turam bhagasya dhīmahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत्। स॒वि॒तुः। वृ॒णी॒म॒हे॒। व॒यम्। दे॒वस्य॑। भोज॑नम्। श्रेष्ठ॑म्। स॒र्व॒ऽधात॑मम्। तुर॑म्। भग॑स्य। धी॒म॒हि॒ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:82» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब नव ऋचावाले बयासीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (वयम्) हम लोग (भगस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त (सवितुः) अन्तर्य्यामी (देवस्य) सम्पूर्ण के प्रकाशक जगदीश्वर का जो (श्रेष्ठम्) अतिशय उत्तम और (भोजनम्) पालन वा भोजन करने योग्य (सर्वधातमम्) सब को अत्यन्त धारण करनेवाले (तुरम्) अविद्या आदि दोषों के नाश करनेवाले सामर्थ्य को (वृणीमहे) स्वीकार करते और (धीमहि) धारण करते हैं (तत्) उसको तुम लोग स्वीकार करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सबसे उत्तम जगदीश्वर की उपासना करके अन्य की उपासना का त्याग करते हैं, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवस्य भोजनम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वयम्) = हम (सवितुः) = उस उत्पादक (देवस्य) = प्रकाशमय सर्वव्यवहार साधक प्रभु के (तत्) = प्रसिद्ध (भोजनम्) = पालक धन को (वृणीमहे) = वरते हैं। उस प्रभु से दिये जानेवाले धन का ही चुनाव करते हैं। प्रभु से दिये जानेवाला यह धन सदा सुपथ से अर्जित होता है। हम अपने कर्त्तव्य कर्मों में अभियुक्त होते हैं और प्रभु हमें योगक्षेम [भोजन] प्राप्त कराते हैं। इसी योगक्षेम का ही हम वरण करते हैं। [O, God! Give me my daily bread Bible] [२] इस (भगस्य) = सब के उपास्य ऐश्वर्यों के स्वामी के इस धन को हम प्राप्त करके (धीमहि) = धारण करते हैं। यह धन ('श्रेष्ठं') = श्रेष्ठ है, प्रशस्यतम है, सुपथ से कमाया जाने के कारण प्रशंसनीय है। (सर्वधातमम्) = यह यज्ञों में विनियुक्त होने के कारण सबका धारण करनेवाला है। (तुरम्) = यह धन शत्रुओं का विहिंसक है, इस धन से हम विषयवासनारूप शत्रुओं का शिकार नहीं होते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- कर्त्तव्य कर्मों में नित्याभियुक्त होकर हम प्रभु से दिये जानेवाले धन की याचना करते हैं। यह धन हमारे जीवन को श्रेष्ठ बनाता है, सबका धारण करता है, इससे हम विषयवासनारूप शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होते।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मनुष्यैः क उपास्य इत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! वयं भगस्य सवितुर्देवस्य यच्छ्रेष्ठं भोजनं सर्वधातमं तुरं वृणीमहे धीमहि तद्यूयं स्वीकुरुत ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) (सवितुः) अन्तर्य्यामिणो जगदीश्वरस्य (वृणीमहे) स्वीकुर्महे (वयम्) (देवस्य) सकलप्रकाशकस्य (भोजनम्) पालनं भोक्तव्यं वा (श्रेष्ठम्) अतिशयेन प्रशस्तम् (सर्वधातमम्) यः सर्वं दधाति सोऽतिशयितस्तम् (तुरम्) अविद्यादिदोषनाशकं सामर्थ्यम् (भगस्य) सकलैश्वर्य्ययुक्तम् (धीमहि) दधीमहि ॥१॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः सर्वोत्तमजगदीश्वरमुपास्यान्यस्योपासनं त्यजन्ति ते सर्वैश्वर्य्या भवन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We choose to pray to the lord creator Savita for his love and favour so that we may receive the highest, all sustaining and all victorious glory of the lord self- refulgent and omnipotent.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should be adored by men is told.

अन्वय:

O men ! as we accept and uphold the Power of God which is destroyer of ignorance and other evils. It is nourisher, the best and the greatest upholder of all, and of God who is Indwelling spirit, Illuminator of all and Lord of the world. So you should' also do.

भावार्थभाषाः - The persons who give up the worship of any one else except God, who is the Lord of the World, attain full wealth and enjoy prosperity.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात ईश्वर व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची या पूर्वीच्या सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - जी माणसे सर्वांत उत्तम जगदीश्वराची उपासना करतात इतरांची उपासना करत नाहीत. ती संपूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त करतात. ॥ १ ॥