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देवता: अश्विनौ ऋषि: अत्रिः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

यो भूयि॑ष्ठं॒ नास॑त्याभ्यां वि॒वेष॒ चनि॑ष्ठं पि॒त्वो रर॑ते विभा॒गे। स तो॒कम॑स्य पीपर॒च्छमी॑भि॒रनू॑र्ध्वभासः॒ सद॒मित्तु॑तुर्यात् ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo bhūyiṣṭhaṁ nāsatyābhyāṁ viveṣa caniṣṭham pitvo rarate vibhāge | sa tokam asya pīparac chamībhir anūrdhvabhāsaḥ sadam it tuturyāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। भूयि॑ष्ठम्। नास॑त्याभ्याम्। वि॒वेष॑। चनि॑ष्ठम्। पि॒त्वः। रर॑ते। वि॒ऽभा॒गे। सः। तो॒कम्। अ॒स्य॒। पी॒प॒र॒त्। शमी॑भिः। अनू॑र्ध्वऽभासः। सद॑म्। इत्। तु॒तु॒र्या॒त् ॥४॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:77» मन्त्र:4 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यः) जो (नासत्याभ्याम्) नहीं विद्यमान असत्य जिनके उनसे (शमीभिः) कर्म्मों के द्वारा (भूयिष्ठम्) अतीव बहुत (चनिष्ठम्) अतिशय अन्न को (विवेष) व्याप्त होता है और (पित्वः) अन्न के (विभागे) विभाग में (ररते) देता है (सः) वह (अनूर्ध्वभासः) नहीं ऊपर कान्तियाँ जिसकी (अस्य) इसके (तोकम्) सन्तान का (पीपरत्) पालन करे वह (इत्) ही (सदम्) प्राप्त दुःख का (तुतुर्यात्) नाश करे ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो अग्नि और जल से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे जगत् का रक्षण करके सम्पूर्ण दुःख के नाश करने योग्य हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणायाम- सात्विक अन्न का सेवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (नासत्याभ्याम्) = इन प्राणापानों के लिये (भूयिष्ठम्) = अत्यधिक (विवेष) = व्याप्तिवाला होता है, अर्थात् जो प्राणापान को साधना के लिये अधिकाधिक समय को देता है तथा (विभागे) = हविर्विभागवाले यज्ञादि कर्मों के होने पर (पित्वः चनिष्ठम्) = अन्नों में उत्तम अन्नों को इनके लिये (ररते) = देता है। अर्थात् यज्ञशेष के रूप में सात्त्विक अन्नों का सेवन करता है। (सः) = वह व्यक्ति (अस्य तोकम्) = इस अपने शरीरस्थ की वृद्धि को (पीपरत्) = पालित करता है। अर्थात् प्राणायाम व यज्ञशिष्ट सात्त्विक अन्न के सेवन से उसका यह शरीर सब दृष्टियों से उन्नत ही उन्नत होता है। [२] यह प्राणसाधक पुरुष (शमीभिः) = शान्त भाव से किये जानेवाले कर्मों से (अनूर्ध्वभासः) = अतेजस्विताओं को [न ऊर्ध्व भास्] अथवा अयज्ञिय भावनाओं को जिनमें यज्ञाग्नि का प्रज्वलन नहीं होता, उन वृत्तियों को (सदं इत्) = सदा ही (तुतुर्यात्) = विनष्ट करता है, अर्थात् यह तेजस्वी व यज्ञशील बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणायाम करने व सात्त्विक यज्ञशिष्ट अन्न के सेवन से यह शरीर वृद्धि को प्राप्त करता है। हम तेजस्वी व यज्ञशील बनते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यो नासत्याभ्यां शमीभिर्भूयिष्ठं चनिष्ठं विवेष पित्वो विभागे ररते सोऽनूर्ध्वभासोऽस्य तोकं पीपरत् स इत्सदं तुतुर्यात् ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) (भूयिष्ठम्) अतिशयेन बहु (नासत्याभ्याम्) अविद्यमानासत्याभ्याम् (विवेष) वेवेष्टि (चनिष्ठम्) अतिशयेनान्नम् (पित्वः) अन्नस्य (ररते) राति ददाति (विभागे) (सः) (तोकम्) अपत्यम् (अस्य) (पीपरत्) पालयेत् (शमीभिः) कर्म्मभिः (अनूर्ध्वभासः) न ऊर्द्ध्वा भासो दीप्तिर्यस्य (सदम्) प्राप्तं दुःखम् (इत्) (तुतुर्यात्) हिंस्यात् ॥४॥
भावार्थभाषाः - येऽग्न्युदकाभ्यां बहूनि कार्य्याणि साध्नुवन्ति ते जगतो रक्षणं कृत्वा सर्वं विषादं हन्तुमर्हन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - One who serves and works with the Ashvins, leading lights of divinity and humanity, all free from untruth and falsehood, achieves by his creative works abundant cherished food. He shares the food and success with others in yajnic living, advances his rising generation by the same works, surpasses those who do not raise the sacred-fire, and always destroys the evils.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The men's duties are stated.

अन्वय:

O men ! one who by the help or guidance of the men of absolutely truthful conduct obtains abundant food materials by his actions and distributes that food among the needy, furthers with (promotes. Ed.) such holy works and his offspring, he surpasses those whose flames ascend not, i. e., who do not perform Yajnas. He is able to destroy the obstructions or sufferings (hardships. Ed.) that come on the way.

भावार्थभाषाः - Those who are able to accomplish many works with fire and water, they protect the world and can alleviate much sufferings.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे अग्नी व जलाने पुष्कळ कार्य करतात. ते जगाचे रक्षण करून संपूर्ण दुःखाचा नाश करू शकतात. ॥ ४ ॥