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को वा॑म॒द्य पु॑रू॒णामा व॑व्ने॒ मर्त्या॑नाम्। को विप्रो॑ विप्रवाहसा॒ को य॒ज्ञैर्वा॑जिनीवसू ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ko vām adya purūṇām ā vavne martyānām | ko vipro vipravāhasā ko yajñair vājinīvasū ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः। वा॒म्। अ॒द्य। पु॒रू॒णाम्। आ। व॒व्ने॒। मर्त्या॑नाम्। कः। विप्रः॑। वि॒प्र॒ऽवा॒ह॒सा॒। कः। य॒ज्ञैः। वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:74» मन्त्र:7 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (विप्रवाहसा) विद्वानों से प्राप्त होने योग्य (वाजिनीवसू) धन धान्य प्राप्त करानेवालो ! (पुरूणाम्) बहुत (मर्त्यानाम्) मनुष्यों के मध्य में (कः) कौन (विप्रः) बुद्धिमान् (अद्य) आज (वाम्) आप दोनों का (आ, वव्ने) अच्छे प्रकार आदर करता (कः) कौन (यज्ञैः) यज्ञों से विद्या को और (कः) कौन बुद्धि का आदर करता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो विद्या की याचना करते हैं वे विद्वान् के समीप प्राप्त होकर प्रश्न और उत्तरों से आनन्द कर के लाभ को प्राप्त होवें, वे अन्यों को भी प्राप्त करा सकें ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विप्रता व यज्ञशीलता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पुरूणाम्) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (मर्त्यानाम्) = मनुष्यों में (कः) = कोई विरला ही (अद्य) = आज (वाम्) = आपका (आवने) = सर्वतः भजन करता है। प्राणसाधना की ओर विरले पुरुष प्रवृत्त होते हैं। [२] हे (विप्रवाहसा) = ज्ञानियों का धारण करनेवाले प्राणपानो! (कः विप्रः) = कोई विरला ही ज्ञानी पुरुष आपका उपासन करता है । हे (वाजिनीवसू) = शक्तिरूप धनवाले प्राणापानो ! (कः) = कोई विरला व्यक्ति ही (यज्ञैः) = यज्ञों के हेतु से आपका उपासन करता है। आपकी उपासना जीवन को यज्ञमय बनाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्राणसाधना [१] हमारा पालन व पूरण करती है [पुरूणाम् ], [२] यह हमें विप्र [ज्ञानी] बनाती है । [३] इससे हम यज्ञशील बनते हैं, 'प्रभु पूजन, परस्पर संगतिकरण व दान' की वृत्तिवाले होते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे विप्रवाहसा वाजिनीवसू ! पुरूणां मर्त्यानां मध्ये को विप्रोऽद्य वामावव्ने को यज्ञैर्विद्यां कश्च प्रज्ञां वव्ने ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) (वाम्) युवयोः (अद्य) (पुरूणाम्) बहूनाम् (आ) (वव्ने) संभजति (मर्त्यानाम्) मनुष्याणाम् (कः) (विप्रः) मेधावी (विप्रवाहसा) यौ विद्वद्भिः प्रापणीयौ (कः) (यज्ञैः) (वाजिनीवसू) धनधान्यप्रापकौ ॥७॥
भावार्थभाषाः - ये विद्यां याचन्ते ते विदुषः सनीडं प्राप्य प्रश्नोत्तरैरानन्द्य महान्तं लाभं प्राप्नुयुस्तेऽन्यानपि प्रापयितुं शक्नुयुः ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who of the many many mortals today could win your love and favour, O favourite celebrities of the saints and scholars? Which one of the wisest? Which one at last could win your recognition and favour, O commanders of the treasures of food, energy, wealth, power and the forces of life? By all yajnas at his command, could he? Probably, for sure may be.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should men do further is told.

अन्वय:

O enlightened men! you are approachable by the highly learned persons. O conveyor of wealth and food! who adores you well among the mortals? Who is the man who desires to acquire knowledge with the Yajnas, and who desires to attain wisdom?

भावार्थभाषाः - Those who desire to acquire knowledge may go to the enlightened persons and may be highly benefited by the questions and answers. Let them benefit others also thereby.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्येची याचना करतात त्यांनी विद्वानांचा संग करून प्रश्नोत्तराचा आनंद घ्यावा व लाभान्वित व्हावे. इतरांनाही तो आनंद प्राप्त करून द्यावा. ॥ ७ ॥