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कुह॒ त्या कुह॒ नु श्रु॒ता दि॒वि दे॒वा नास॑त्या। कस्मि॒न्ना य॑तथो॒ जने॒ को वां॑ न॒दीनां॒ सचा॑ ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kuha tyā kuha nu śrutā divi devā nāsatyā | kasminn ā yatatho jane ko vāṁ nadīnāṁ sacā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कुह॑। त्या। कुह॑। नु। श्रु॒ता। दि॒वि। दे॒वा। नास॑त्या। कस्मि॑न्। आ। य॒त॒थः॒। जने॑। कः। वा॒म्। न॒दीना॑म्। सचा॑ ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:74» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को विद्वानों के प्रति कैसे पूछना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! (त्या) ये (नासत्या) सत्यस्वरूप (कुह) कहाँ वर्त्तमान हैं और (कुह) कहाँ (श्रुता) सुने हुए (देवा) श्रेष्ठ गुणवाले होते हैं और तुम (कस्मिन्) किस (जने) जन में (आ, यतथः) सब ओर से यत्न करते हो (वाम्) उन आप दोनों की (नदीनाम्) नदियों के (सचा) सम्बन्ध से (कः) कौन (नु) शीघ्र है जो (दिवि) श्रेष्ठ व्यवहार वा प्रकाश में प्रयत्न करते हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासु जनों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर बिजुली आदि की विद्याओं को पूछें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिवि देवा नासत्या

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कुह) = कहाँ (त्या) = वे प्रसिद्ध प्राणापान निवास करते हैं ! शरीर में कहाँ प्राण का स्थान है और कहाँ अपान का? (नु) = अब (कुह) = किस कार्यक्षेत्र में (श्रुता) = ये प्रसिद्ध हैं? उत्तर देते हुए कहते हैं कि (दिवि) = ये मस्तिष्करूप द्युलोक में रहते हैं। वस्तुतः शरीर में स्थित सब देवों का कार्यालय यह मस्तिष्करूप द्युलोक ही है। ये (देवा) = प्रकाशमय हैं, (नासत्या) = शरीर को असत्य से रहित करते हैं। प्राण प्रकाश को देता है, तो अपान असत्य को दूर करता है । [२] प्राणापान के महत्त्व को न समझने के कारण कोई विरला व्यक्ति ही इनकी साधना करता है। (कस्मिन् जने) = किसी एक आध व्यक्ति के जीवन में ही हे प्राणापानो! आप (आयतथ:) = यत्न करते हो। जब वह व्यक्ति प्राणसाधना करता है, तो वह (कः) = कोई विरला व्यक्ति ही (वाम्) = आपकी (नदीनाम्) = ज्ञानवाणियों को (सचा) = अपने में समवेत करनेवाला होता है प्राणसाधना से अशुद्धि क्षय होकर ज्ञानदीप्ति होती ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जिस मनुष्य के जीवन में प्राणों की साधना चलती है, वहाँ ज्ञान की वाणियाँ भी विकसित होती हैं। प्राणापान का मुख्य कार्य जीवन को प्रकाशमय बनाना ही है। ये जीवन से असत्य को दूर कर देते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैर्विदुषः प्रति कथं प्रष्टव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे अध्यापकोपदेशकौ ! त्या नासत्या कुह वर्त्तेते कुह श्रुता देवा भवतो युवां कस्मिञ्जन आ यतथो वां तयोर्युवयोर्नदीनां सचा को न्वस्ति यौ दिव्या यतथः ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कुह) क्व (त्या) तौ (कुह) (नु) सद्यः (श्रुता) श्रुतौ (दिवि) दिव्ये व्यवहारे प्रकाशे वा (देवा) दिव्यगुणौ (नासत्या) सत्यस्वरूपौ (कस्मिन्) (आ) (यतथः) यतेथे। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदम्। (जने) (कः) (वाम्) युवाम् (नदीनाम्) (सचा) समवाये ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासुभिर्विदुषां सनीडं गत्वा विद्युदादिविद्याः प्रष्टव्याः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Where are they? Where are they heard and renowned, the brilliant ones in heaven, ever dedicated to truth in heavenly conduct and behaviour? O brilliant divines, Ashvins, in which community do you operate? Who shares and benefits from your flowing rivers and rolling oceans?
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should men ask the enlightened persons is told.

अन्वय:

O teachers and preachers! where are those who are free from all falsehood and are absolutely truthful? Where are the famous enlightened men who are endowed with divine virtues? Who is the person whom you try (teach and. Ed.) train? Who is your pupil or companion on the confluence of the rivers.

भावार्थभाषाः - The seekers after truth and knowledge, should go to the enlightened persons and should ask them about the science of electricity and others subjects.
टिप्पणी: An ideal place for learning of the spiritual science is described in the Vedas Where उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनाम् Here also the confluence of rivers has been described as an ideal place for acquiring purity of mind.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जिज्ञासू लोकांनी विद्वानांकडून विद्युत इत्यादीच्या विद्येबाबत माहिती घ्यावी. ॥ २ ॥