यद॒द्य स्थः प॑रा॒वति॒ यद॑र्वा॒वत्य॑श्विना। यद्वा॑ पु॒रू पु॑रुभुजा॒ यद॒न्तरि॑क्ष॒ आ ग॑तम् ॥१॥
yad adya sthaḥ parāvati yad arvāvaty aśvinā | yad vā purū purubhujā yad antarikṣa ā gatam ||
यत्। अ॒द्य। स्थः। प॒रा॒ऽवति॑। यत्। अ॒र्वा॒ऽवति॑। अ॒श्वि॒ना॒। यत्। वा॒। पु॒रु। पु॒रु॒ऽभु॒जा॒। यत्। अ॒न्तरि॑क्षे। आ। ग॒त॒म् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब दश ऋचावाले तिहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में फिर स्त्री-पुरुष कैसे वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
परावति-अर्वावति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स्त्रीपुरुषौ कथं वर्त्तेयातामित्याह ॥
हे स्त्रीपुरुषा ! यदश्विना परावति यदर्वावति यत् पुरुभुजा वा यदन्तरिक्षे पुरू स्थस्तयोर्विज्ञानायाऽद्यागतम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should men and women behave is told.
O men and women! come here today for acquiring of the knowledge of air and electricity (energy. Ed.), which are nourishers of many, whether they are far remote or near at hand or are in large measures in the sky.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अंतरिक्ष, पृथ्वी व विद्वान यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
