आ मि॒त्रे वरु॑णे व॒यं गी॒र्भिर्जु॑हुमो अत्रि॒वत्। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये ॥१॥
ā mitre varuṇe vayaṁ gīrbhir juhumo atrivat | ni barhiṣi sadataṁ somapītaye ||
आ। मि॒त्रे। वरु॑णे। व॒यम्। गीः॒ऽभिः। जु॒हु॒मः॒। अ॒त्रि॒ऽवत्। नि। ब॒र्हिषि॑। स॒द॒त॒म्। सोम॑ऽपीतये ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तीन ऋचावाले बहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों के प्रति कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञशीलता व सोमरक्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यान् प्रति कथं कथं वर्त्तितव्यमित्याह ॥
हे अध्यापकोपदेशकौ ! वयं गीर्भिरत्रिवन्मित्रे वरुण आ जुहुमः युवां सोमपीतये बर्हिषि उत्तमे नि सदतम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should men deal with others is told.
O teachers and preachers! with our speeches we invite you-a friend and a noble person, like a man who is free from three kinds of sufferings. Please be seated in a good house or a good Asana (seat of grass, cloth or wood) to drink Soma (juice of the invigorating plants or herbs.)
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात मित्र व श्रेष्ठ विद्वानाच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर पूर्वसूक्तार्थाची संगती जाणावी.
