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ता वां॑ स॒म्यग॑द्रुह्वा॒णेष॑मश्याम॒ धाय॑से। व॒यं ते रु॑द्रा स्याम ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā vāṁ samyag adruhvāṇeṣam aśyāma dhāyase | vayaṁ te rudrā syāma ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता। वा॒म्। स॒म्यक्। अ॒द्रु॒ह्वा॒णा॒। इष॑म्। अ॒श्या॒म॒। धाय॑से। व॒यम्। ते। रु॒द्रा॒। स्या॒म॒ ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:70» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अद्रुह्वाणा) द्वेष से रहित (रुद्रा) रोदन से शब्द करानेवाले ! (वयम्) हम लोग (वाम्) आप दोनों के (धायसे) धारण करने को (इषम्) अन्न वा विज्ञान को (सम्यक्) उत्तम प्रकार (अश्याम) प्राप्त होवें (ते) वे हम लोग (ता) उन दोनों का सेवन करते हुए सब के धारण करने को (स्याम) होवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - वे ही अध्यापक और उपदेशक कृतक्रिय होवें, जो क्रोध और लोभ आदि दोषों से रहित होवें और जो उनसे पढ़ते हैं, वे विद्या के धारण में प्रयत्न करते हुए होवें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्रुह्वाणा- रुद्रा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मित्र वरुण) = स्नेह व निर्देषता की देवताओ ! (ता वाम्) = वे आप दोनों (सम्यक्) = पूर्णतया (अद्रुह्वाणा) = अद्रोग्धा हैं, द्रोह न करनेवाले हैं। आपकी उपासना मुझे सब हिंसनों से बचाती है। [२] आपके द्वारा प्रसन्न हृदय में हम धायसे धारण के लिये (इषं अश्याम) = प्रभु की प्रेरणा को प्राप्त करें। यह प्रभु प्रेरणा हमें मार्ग दिखाये । हे (रुद्रा) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त कराने के द्वारा सब [रुत्] रोगों के [द्रावयितारौ] भगानेवाले प्राणापानो ! (वयम्) = हम (ते) = [तब] आपके (स्याम) = हों। हम सदा रोगों को दूर रखनेवाले हों। वस्तुतः मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति स्वस्थ बनता ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मित्र और वरुण द्रोहशून्य हैं। ये सब रोगों के दूर करनेवाले हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अद्रुह्वाणा रुद्रा ! वयं वां धायस इष सम्यगश्याम ते वयं ता सेवन्तः सर्वस्य धायसे स्याम ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ता) तौ (वाम्) युवयोः (सम्यक्) (अद्रुह्वाणा) द्रोहरहितौ (इषम्) अन्नं विज्ञानं वा (अश्याम) प्राप्नुयाम (धायसे) धर्त्तुम् (वयम्) (ते) (रुद्रा) रुतो रोदनाद्रावयितारौ (स्याम) भवेम ॥२॥
भावार्थभाषाः - तावेवाध्यापकोपदेशकौ कृतक्रियौ भवतां यौ क्रोधलोभादिविरहौ स्यातां ये ताभ्यामधीयते ते विद्याधारणे प्रयतमानाः स्युः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Mitra and Varuna, Loving friends of justice and rectitude, free from hate and jealousy and destroyers of violence and injustice, may we receive, we pray, that energy and sustenance, that protection, guidance and wisdom of yours so that we may internalise it and pursue it in our life and conduct.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The men's duties are stated.

अन्वय:

O benignant teachers and preachers! you are free from malice and are removers from or eradicators of grief. May we attain food and knowledge to uphold you. While erving you, may we become upholders or sustainers of all.

भावार्थभाषाः - Those teachers and preachers are blessed and successful who are devoid of anger, greed and other evils. Those who learn from them, let them be always industrious to receive and retain that knowledge.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे क्रोध, लोभ इत्यादी रहित असतात व जे त्यांच्याकडून शिकण्याचा प्रयत्न करतात तेच अध्यापक व उपदेशक कृतक्रिय असतात. ॥ २ ॥