पु॒रू॒रुणा॑ चि॒द्ध्यस्त्यवो॑ नू॒नं वां॑ वरुण। मित्र॒ वंसि॑ वां सुम॒तिम् ॥१॥
purūruṇā cid dhy asty avo nūnaṁ vāṁ varuṇa | mitra vaṁsi vāṁ sumatim ||
पु॒रु॒ऽउ॒रुणा॑। चि॒त्। हि। अस्ति॑। अवः॑। नू॒नम्। वा॒म्। व॒रु॒ण॒। मित्र॑। वंसि॑। वा॒म्। सु॒ऽम॒तिम् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चार ऋचावाले सत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रक्षण व सुमति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे मित्र वरुण ! हि वां यत्पुरूरुणा नूनमवोऽस्ति यत् चित् त्वं वंसि यो वां सुमतिं गृह्णाति तौ युवां तं च वयं सेवेमहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do is told.
O friend and noble person! let us serve your protection which extends far and wide and is certain (assured. Ed.), and which each one of you distribute or share or share with you which. Let us serve him also who takes your good intellect or wisdom. (May we obtain your kind goodwill).
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात प्राण, उदान व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगता जाणावी.
