प्र वो॑ मि॒त्राय॑ गायत॒ वरु॑णाय वि॒पा गि॒रा। महि॑क्षत्रावृ॒तं बृ॒हत् ॥१॥
pra vo mitrāya gāyata varuṇāya vipā girā | mahikṣatrāv ṛtam bṛhat ||
प्र। वः॒। मि॒त्राय॑। गा॒य॒त॒। वरु॑णाय। वि॒पा। गि॒रा। महि॑ऽक्षत्रौ। ऋ॒तम्। बृ॒॒हत् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब मनुष्यों को परस्पर क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
क्षत्र - ऋत
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैर्मिथः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे मनुष्या ! वो यौ विपा महिक्षत्रौ बृहदृतं गृह्णीयातां ताभ्यां मित्राय वरुणाय यूयं गिरा प्र गायत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do towards each other is told.
O men! sing the glory with your speech in praise of the friend and a man of noble character who protects you in various ways. In fact, they are they endowed with much vital power, and always accepting great truths.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात मित्र, श्रेष्ठ व विद्वान यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
