विश्वे॒ हि वि॒श्ववे॑दसो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। व्र॒ता प॒देव॑ सश्चिरे॒ पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः ॥३॥
viśve hi viśvavedaso varuṇo mitro aryamā | vratā padeva saścire pānti martyaṁ riṣaḥ ||
विश्वे॑। हि। वि॒श्वऽवे॑दसः। वरु॑णः। मि॒त्रः। अ॒र्य॒मा। व्र॒ता। प॒दाऽइ॑व। स॒श्चि॒रे॒। पान्ति॑। मर्त्य॑म्। रि॒षः ॥३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'वरुण-मित्र व अर्यमा' का विश्ववेदस्त्व
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः कथं वर्त्तितव्यमित्याह ॥
हे मनुष्या ! ये विश्वे विश्ववेदसो वरुणो मित्रोऽर्यमा च पदेव व्रता सश्चिरे रिषो मर्त्यं पान्ति ते हि युष्माभिर्माननीयाः सन्ति ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should men behave is told.
O men! you should honour all those who have attained all knowledge and wealth. You are the best, and noble friend of all and dispenser of justice who observes (and treats. Ed.) all others like feet (a powerful organ. Ed.) and saves men from sins.
