बळि॒त्था दे॑वा निष्कृ॒तमादि॑त्या यज॒तं बृ॒हत्। वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्वर्षि॑ष्ठं क्ष॒त्रमा॑शाथे ॥१॥
baḻ itthā deva niṣkṛtam ādityā yajatam bṛhat | varuṇa mitrāryaman varṣiṣṭhaṁ kṣatram āśāthe ||
बट्। इ॒त्था। दे॒वा॒। निः॒ऽकृ॒तम्। आदि॑त्या। य॒ज॒तम्। बृ॒हत्। वरु॑ण। मित्र॑। अर्य॑मन्। वर्षि॑ष्ठम्। क्ष॒त्रम्। आ॒शा॒थे॒ इति॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले सड़सठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसके तुल्य क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'निष्कृत-यजत बृहत्' क्षत्र
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः किंवत् किं करणीयमित्याह ॥
हे देवा आदित्या मित्र वरुण ! युवां बृहन्निष्कृतं यजतं, हे अर्य्यमन्नित्था त्वं च यज। हे मित्रावरुण ! युवां यथा बड् वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे तथेदमर्यमन्नपि प्राप्नोतु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The men should follow an ideal person is told.
O enlightened immortal friend and noble person! be united with all great that has been accomplished. O friend O dispenser of justice! you should also do the same. and noble person! as you enjoy the most advanced kingdom or wealth, so let this administrator of justice also do.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात मित्र वरुण व विद्वानांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची या पूर्वीच्या सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
