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व॒यं मि॒त्रस्याव॑सि॒ स्याम॑ स॒प्रथ॑स्तमे। अ॒ने॒हस॒स्त्वोत॑यः स॒त्रा वरु॑णशेषसः ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayam mitrasyāvasi syāma saprathastame | anehasas tvotayaḥ satrā varuṇaśeṣasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व॒यम्। मि॒त्रस्य॑। अव॑सि। स्याम॑। स॒प्रथः॑ऽतमे। अ॒ने॒हसः॑। त्वाऽऊ॑तयः। स॒त्रा। वरु॑णऽशेषसः ॥५॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:65» मन्त्र:5 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (अनेहसः) नहीं हिंसक होते हुए (त्वोतयः) आपसे रक्षित और (वरुणशेषसः) उत्तम जन शेष जिनके वे (वयम्) हम लोग (सत्रा) सत्य से युक्त (मित्रस्य) मित्र के (सप्रथस्तमे) अतिविस्तार युक्त (अवति) रक्षण आदि कर्म्म में (स्याम) प्रवृत्त होवें ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि सदा कृतज्ञता करें और कृतघ्नता का दूर से त्याग करें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वरुण के सन्तानों का परस्पर प्रेम भाव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वयम्) = हम (मित्रस्य) = स्नेह की देवता के (सप्रथस्तमे) = अत्यन्त विस्तारवाले (अवसि) = रक्षण में (स्याय) = हों। स्नेह को जीवन का सूत्र बनाकर अपने जीवन का रक्षण करनेवाले बनें। द्वेष से शरीर में विष ही तो उत्पन्न होते हैं। [२] (त्वा उतयः) = हे मित्र ! तेरे से रक्षित हुए हुए हम (अनेहसः) = निष्पाप हों। स्नेह हमें पाप की ओर नहीं ले जाता। ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध के कारण ही सामान्यतः पापों को जन्म मिलता है और हम परस्पर विरोध में लड़नेवाले हो जाते हैं। हम तो (वरुणशेषसः) = वरुण के सन्तान [शेष-सन्तान] बनकर, निर्देषता को जीवन में धारण करके (सत्रा) = साथ ही हों, मिलकर ही चलनेवाले बनें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्नेह की भावना हमारे जीवन का रक्षण करती हैं, इसी में शक्तियों का विस्तार होता है। निर्द्वेषता हमें परस्पर समीप लाती है। निर्देषता में ही झगड़ों का अभाव होकर सब प्रकार की उन्नति है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथाऽनेहसस्त्वोतयो वरुणशेषसो वयं सत्रा मित्रस्य सप्रथस्तमेऽवसि स्याम ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वयम्) (मित्रस्य) (अवसि) रक्षणादौ कर्मणि (स्याम) प्रवृत्ता भवेम (सप्रथस्तमे) अतिविस्तारयुक्ते (अनेहसः) अहिंसकाः सन्तः (त्वोतयः) त्वया रक्षिताः (सत्रा) सत्येन युक्ताः (वरुणशेषसः) वरुण उत्तमो जनः शेषो येषान्ते ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैः सर्वदा कृतज्ञता भाव्या कृतघ्नता च दूरतस्त्याज्या ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us pray and make effort that we may abide in the widest protection of Mitra, lord of mercy, friend and lover of the universe. Let us be free from sin, evil and violence, safe under your protection, O Lord, ever dedicated to truth and law, and let us live as loved children of Varuna, lord of justice and rectitude.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The teacher-pupil and speaker audience relation is narrated.

अन्वय:

O men ! being non-violent, harmless or guarded and truthful to God and associating with the best personalities, let us always be under the shelter of a good friend, who shelters or extends his shelter to utmost distance.

भावार्थभाषाः - Men should always be grateful and should give up ingratitude altogether,
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी सतत कृतज्ञ असावे. कृतघ्नतेचा त्याग करावा. ॥ ५ ॥