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उ॒त मे॑ वोचता॒दिति॑ सू॒तसो॑मे॒ रथ॑वीतौ। न कामो॒ अप॑ वेति मे ॥१८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta me vocatād iti sutasome rathavītau | na kāmo apa veti me ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। मे॒। वो॒च॒ता॒त्। इति॑। सु॒तऽसो॑मे। रथ॑ऽवीतौ। न। कामः॑। अप॑। वे॒ति॒। मे॒ ॥१८॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:61» मन्त्र:18 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:5» मन्त्र:18


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! आप (मे) मेरे लिये (रथवीतौ) वाहनों के गमन में (उत) और (सुतसोमे) उत्पन्न किये हुए ऐश्वर्य्य आदि में सत्य का उपदेश देने योग्य हैं (इति) इस प्रकार (वोचतात्) उपदेश देवें जिससे (मे) मेरी (कामः) कामना (न) नहीं (अप, वेति) नष्ट होती है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् जनों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को ऐसे उपदेश करो, जिससे हम लोगों की इच्छायें सिद्ध होवें ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुतसोम-रथवीति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र की (ऊर्म्या) = प्रकाश की किरणों में उत्तम वेदवाणी (उत) = निश्चय से (मे) = मुझे (वोचतात्) = उपदेश करे (इति) = कि (सुतसोमे) = [सुतः सोमो येन] सोम [वीर्यशक्ति] का सम्पादन करनेवाला तथा (रथवीतौ) = शरीर-रथ को कान्त [सुन्दर] बनानेवाला होने में (मे कामः) = मेरी कामना (न अपवेति) = दूर नहीं होती है । [२] मुझे इस वेदवाणी से प्रेरणा प्राप्त हो और मैं सदा सोम [वीर्यशक्ति] का सम्पादन करूँ तथा अपने शरीर-रथ को सुन्दर ही सुन्दर बना डालूँ । सुरक्षित सोम ने ही तो इसे सौन्दर्य प्रदान करना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वेद से प्रेरणा प्राप्त करके हम 'सुतसोम रथवीति' बनें, वीर्य का सम्पादन करनेवाले, कान्त शरीरवाले ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे विद्वन् ! भवान् मे रथवीतावुत सुतसोमे सत्यमुपदेश्यमिति वोचतात्। यतो मे कामो नाप वेति ॥१८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (मे) मह्यम् (वोचतात्) उपदिशतु (इति) (सुतसोमे) निष्पादितैश्वर्य्यादौ (रथवीतौ) रथानां गतौ (न) (कामः) कामना (अप) (वेति) नश्यति (मे) मम ॥१८॥
भावार्थभाषाः - सर्वैर्मनुष्यैर्विदुषः प्रतीयं प्रार्थना कार्या भवन्तोऽस्मभ्यमीदृशानुपदेशान् कुर्वन्तु यतोऽस्माकमिच्छाः सिद्धाः स्युरिति ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And then say this for me: The yajna is complete, soma is distilled, the chariot arrived in peace, and my prayer and desire never goes astray.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of enlightened men's duties is dealt.

अन्वय:

O highly learned person! you should always tell that on the occasion of the movement of the vehicles and on the acquisition of wealth, truth must be preached, so that my desire may not remain unfulfilled.

भावार्थभाषाः - It is the foremost duty of the learned and enlightened persons to observe truth and also behave truthfully. They should also preach truth only. This way a man's desires are indeed fulfilled.
टिप्पणी: The right person should always make an earnest appeal to an enlightened person so that he should. guide him on the right lines and truthfully. Indeed it helps to build an ideal society.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व माणसांनी, विद्वानांना ही प्रार्थना करावी की तुम्ही आम्हाला असा उपदेश करा की ज्यामुळे आमच्या इच्छा पूर्ण व्हाव्यात. ॥ १८ ॥