वांछित मन्त्र चुनें

यदश्वा॑न्धू॒र्षु पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं हिर॒ण्यया॒न्प्रत्यत्काँ॒ अमु॑ग्ध्वम्। विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ मरुतो॒ व्य॑स्यथ॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad aśvān dhūrṣu pṛṣatīr ayugdhvaṁ hiraṇyayān praty atkām̐ amugdhvam | viśvā it spṛdho maruto vy asyatha śubhaṁ yātām anu rathā avṛtsata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्। अश्वा॑न्। धूः॒ऽसु। पृष॑तीः। अयु॑ग्ध्वम्। हि॒र॒ण्यया॑न्। प्रति॑। अत्का॑न्। अमु॑ग्ध्वम्। विश्वाः॑। इत्। स्पृधः॑। म॒रु॒तः॒। वि। अ॒स्य॒थ॒। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः॑। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥६॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:55» मन्त्र:6 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) वायु के सदृश वेग और बल से युक्त जनो ! जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्त्तमान हैं, वैसे (धूर्षु) विमान आदि यानों के अवयव कोष्ठों में (यत्) जिन (हिरण्ययान्) ज्योतिर्मय (प्रति, अत्कान्) स्पष्ट (पृषतीः) वायु और जल के गमनों और (अश्वान्) अग्नि आदिकों को आप लोग (अयुग्ध्वम्) संयुक्त कीजिये और (अमुग्ध्वम्) त्यागिये, उनसे (विश्वाः) सम्पूर्ण (स्पृधः) स्पर्धायें, रोष (इत्) ही (वि) विशेष करके (अस्यथ) चलाइये ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अग्नि, वायु और जल आदिकों को वाहनों में उत्तम प्रकार युक्त करते हैं, वे विजय के लिये समर्थ होकर धर्मसम्बन्धी मार्ग के अनुगामी होते हैं ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हिरण्यय कवचधारी सैनिक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (पृषती:) [ to hurt, injure] = शत्रुओं का संहार करनेवाले (अश्वान्) = अश्वों को (धूर्षु) = रथ धुराओं में (अयुग्ध्वम्) = जोतते हो। और (हिरण्ययान्) = हितरमणीय अथवा (स्वर्णवत्) = देदीप्यमान (अत्कान्) = कवचों को प्रत्यमुग्ध्वम् धारण करते हो, तो उस समय मरुतः = वीर सैनिको! तुम विश्वाः इत् = सब ही स्पृधः = संग्रामों को [नि० २।१७] व्यस्यथ परे फेंकते हो, सब संग्रामकारी शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले होते हो। [२] शुभम् = शुभ धर्म्ययुद्ध की ओर याताम्= -जाते हुए आपके रथाः = रथ अनु अवृत्सत-अनुकूल वर्तनवाले हों । ये रथ संग्राम विजय में आपके सहायक हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे सैनिक घोड़ों को रथों में जोते हुए तथा कवचों को धारण किये हुए सदा धर्म्ययुद्ध के लिये तैयार हों ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मरुतो ! यथा शुभं यातां रथा अन्ववृत्सत तथा धूर्षु यद्धिरण्ययान् प्रत्यत्कान् पृषतीरश्वान् यूयमयुग्ध्वममुग्ध्वम्। तैर्विश्वाः स्पृध इद् व्यस्यथ ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) यान् (अश्वान्) अग्न्यादीन् (धूर्षु) विमानादियानावयवकोष्ठेषु (पृषतीः) वायुजलगतीः (अयुग्ध्वम्) संयोजयत (हिरण्ययान्) ज्योतिर्मयान् (प्रति) (अत्कान्) व्यक्तान् (अमुग्ध्वम्) मुञ्चत (विश्वाः) समग्राः (इत्) एव (स्पृधः) याः स्पर्ध्यन्ते ताः सङ्ग्रामा वा (मरुतः) वायुवद्वेगबलयुक्ताः (वि) विशेषेण (अस्यथ) प्रचालयत (शुभम्) (याताम्) (अनु) (रथाः) (अवृत्सत) ॥६॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या अग्निवायुजलादीन् यानेषु सम्प्रयुञ्जते ते विजयाय प्रभवो भूत्वा धर्म्यमार्गमनुगा जायन्ते ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Maruts, windy travellers of the skies, when you use liquid fuel and air for motive power in the front part of your chariot, put on your protective golden suit and release the energy drop by drop and spark by spark, you leave behind all the contestants on the journey. Let the chariots roll on with the travellers of space for a noble cause for a noble destination.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The ideal life of a person is described.

अन्वय:

O person ! you are mighty like the.. winds. As the vehicles like the aircrafts accompany those who tread upon the path of righteousness, same way harness fire and other elements which are bright and manifest in the chambers of air vehicles like aeroplanes and combine the movements of air and water with that, so as to conquer all battles, and overcome all adversaries.

भावार्थभाषाः - Those persons who use fire, air and water etc, in various vehicles, become capable to achieve victory and follow the path of Dharma.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे अग्नी, वायू, जल इत्यादींना वाहनात उत्तम प्रकारे वापरतात ती विजय मिळविण्यास समर्थ बनून धर्ममार्गाचे अनुगामी होतात. ॥ ६ ॥