ते म॑ आहु॒र्य आ॑य॒युरुप॒ द्युभि॒र्विभि॒र्मदे॑। नरो॒ मर्या॑ अरे॒पस॑ इ॒मान्पश्य॒न्निति॑ ष्टुहि ॥३॥
te ma āhur ya āyayur upa dyubhir vibhir made | naro maryā arepasa imān paśyann iti ṣṭuhi ||
ते। मे॒। आ॒हुः॒। ये। आ॒ऽय॒युः। उप॑। द्युऽभिः॑। विऽभिः॑। मदे॑। नरः॑। मर्याः॑। अ॒रे॒पसः॑। इ॒मान्। पश्य॑न्। इति॑। स्तु॒हि॒ ॥३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्राण क्या कहते हैं ?
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्याः किं कुर्युरित्याह ॥
येऽरेपसो मर्य्या नरो द्युभिर्विभिर्मदे मे सत्यमाहुराययुस्त इमाम् कामान् पश्यन्निवाऽऽहुरिति त्वं मामुप स्तुहि ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
"What should men do is told.
The absolutely sinless men like the desiring birds told me the truth for delight, because they know and attain it. After actually seeing their desires, they have asked me to praise them.
